श्रीमद्भगवतगीता अवसाद से आनंद की यात्रा है: महामण्डलेश्वर स्वामी अर्जुनदास

AYUSH ANTIMA
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बगड़ (राजेन्द्र शर्मा झेरलीवाला): मोक्षदा एकादशी के अवसर पर मुख्य बाजार स्थित श्रीदादू द्वारा में महामण्डलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज के पावन सानिध्य में गीता जयंती मनाई गई। गीता जयंती के शुभ अवसर पर महाराजश्री ने कहा कि अवसाद से आनन्द, अभाव से परिपूर्णता एवं बन्धन से मुक्ति एवं जीवन की अनन्त संभावनाओं को प्रकट कर ब्रह्मानुभूति की स्थिरता प्रदान करने वाला ग्रन्थ है श्रीमद्भगवद्गीता। गीता केवल धर्म ग्रंथ ही नहीं बल्कि एक अनुपम जीवन ग्रंथ है। जीवन उत्थान के लिए इसका स्वाध्याय प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज सम्पूर्ण विश्व अवसाद ग्रस्त है। गीता अवसाद से आनंद की यात्रा है। गीता को जीवन में धारण करने से न केवल साधु बल्कि समाज का जीवन भी आदर्श जीवन मूल्यों की पराकाष्ठा को छू सकता है। पूज्य महाराजश्री ने कहा - चारित्रिक एवं व्यक्तित्व विकास के लिए गीता के उपदेशों को जीवन में उतारना आवश्यक है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से समस्त विश्व को सकारात्मक एवं उपयोगी उपदेश दिया है। मानव जीवन की सारी समस्याओं का समाधान गीता में है। जीवन एक संग्राम है और इसलिए कुरुक्षेत्र की रणभूमि में गीता का गान एक सुयोग्य पृष्ठभूमि का सर्जन है। भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर, विश्व के मानव मात्र को गीता के ज्ञान द्वारा जीवनाभिमुख बनाने का प्रयास किया है। आज प्रत्येक व्यक्ति सुख चाहता है और सुख प्राप्त करने के बाद भी आत्म संतुष्टि नहीं होती। आज मनुष्य की कामना सुख प्राप्त करने की नहीं, जीवन जीने की भी है और शास्त्र भी इसका उल्लेख करते हैं। शास्त्रों में यह भी निहित है कि मनुष्य जीना चाहता है, सुख चाहता है और इन दोनों के साथ-साथ सम्मान भी पाना चाहता है। मनुष्य को आज स्वयं का भी ज्ञान नहीं है। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस दिन मनुष्य को अपना ज्ञान हो जाएगा तो उसका जीवन भी सफल हो जाएगा। गीता शास्त्र का स्वरुप है और अध्यात्म की तरफ ले जाने का एक मार्ग है। यह यर्थाथ का बोध करवाता है और सत्य का ग्रंथ है। गीता ही जीवन का आधार है। गीता केवल धर्मग्रंथ ही नहीं बल्कि मानव जीवन का वास्तविक सार भी है। अध्यात्म का पहला सुख वर्तमान है तथा वर्तमान जीवन का मूल है। उन्होंने कहा कि पवित्र ग्रंथ गीता किसी को प्रतिस्पर्धा करना नहीं सिखाता, बल्कि यह ग्रंथ सिखाता है कि मनुष्य को स्वयं से ही प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए और इस स्पर्धा में स्वयं को ही जीतने का प्रयास करना चाहिए। 15वें अध्याय में शास्त्र का उल्लेख किया गया है, शास्त्र मनुष्य को जीने की कला सिखाता है। श्रीमद्भगवद् गीता हमे अंतर युद्ध सिखाती है। हमारे अन्दर दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं। एक है - दैवीप्रवृत्ति; जो सद्गुणों से प्रेरित है। और, दूसरी है - आसुरी प्रवृत्ति; जो दुर्गुणों से प्रेरित है। हमें सद्गुणों की सेना हृदय में बढ़ाकर दैवी प्रवृत्ति को सबल करना है और, दुर्गुणों का त्याग कर आसुरी प्रवृत्ति को दुर्बल करना है। युद्ध दैवी प्रवृत्ति और आसुरी प्रवृत्ति के बीच में है। दैवी प्रवृत्ति से आसुरी प्रवृत्ति को हराना हैं। इस प्रकार दैवी प्रवृत्ति परम तत्त्व परमात्मा के तरफ ले जाती है, जो मनुष्य को विशेष मोक्ष दिलाती है। इस अवसर पर बगड़ पालिकाध्यक्ष गोविंद सिंह राठौड़, श्रीदादू द्वारा सर्वाधिकार शिष्य रोहित स्वामी, आशीष स्वामी, व्यापार मंडल अध्यक्ष जितेंद्र सिंह शेखावत, मुकेश काशिमपुरिया, शिवप्रकाश शर्मा, सुभाष राठौड़, मुकेश कुमावत, प्रवीण सैनी, सतीश माहेश्वरी, प्रकाश माहेश्वरी, बाबूलाल दर्जी आदि श्रद्धालु उपस्थित रहे ।
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