अधिकारी हमारी सुनते ही नहीं .......

AYUSH ANTIMA
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वैसे तो राजस्थान में अफसरशाही हावी होने की खबरें लगातार देखने को मिलती है लेकिन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की डुंगरपूर यात्रा में देखने को मिला, जब भाजपा नेताओं ने अपनी पीड़ा वसुंधरा राजे को बताई व भाजपा नेताओं पर अनदेखी का आरोप लगाया। वसुंधरा राजे भी उनकी बात सुनकर हैरान रह गई कि भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं की यह दुर्दशा हो रही है। नेताओं व कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाये कि प्रशासनिक अधिकारी उनकी बात को तवज्जो नहीं देते हैं। विदित हो पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अफसरशाही हावी होने को लेकर अपने क्षेत्र झालावाड़ में रामपुर मे दौरे के दौरान आमजन की पानी की किल्लत को लेकर भड़क उठी और नौकरशाही पर कडा प्रहार करते हुए कहा था कि अफसर सो रहे हैं जनता रो रही है। उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जल जीवन मिशन के तहत 42 हजार करोड़ रुपए दिए गये है। उसका पाई पाई का हिसाब अफसरों को देना होगा। उनके इस बयान की दिल्ली तक गूंज सुनाई दी व केन्द्रीय मंत्री सीआर पाटिल ने तुरंत संज्ञान लिया। इसी संदर्भ में सिविल लाइंस विधायक गोपाल शर्मा ने भी वैशाली नगर अतिक्रमण की कार्यशैली को लेकर सरकार पर नौकरशाही हावी होने को लेकर सवाल खड़े किए थे। इसके साथ ही काबीना मंत्री डॉ.किरोड़ीलाल मीणा तो सरकार के कामकाज को लेकर सार्वजनिक रूप से आलोचना करने के साथ ही उनके कहने पर एक महिला सीआई तक का तबादला तक नहीं किया। नकली खाद व बीज प्रकरण को लेकर भी उन्होंने नौकरशाही को घेरा था। देखा जाए तो नौकरशाही से दुखी होकर या सस्ती लोकप्रियता पाने के चक्कर में जयपुर के एक भाजपा विधायक कभी मीट की दुकानो पर तो कभी थाने में आठ बजे के बाद शराब बिक्री को लेकर चले जाते हैं। उनके विडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं की कचरे के ढेर को लेकर चिंतित नजर आते हैं। उनकी इस कार्यवाही को लेकर क्या सार्थक परिणाम लोगो के सामने आते हैं, यह तो आने वाला समय बताएगा। पूर्व मुख्य सचिव जो राजस्थान के सुपर सीएम बने हुए थे, नौकरशाही का एक ज्वलंत उदाहरण था। उनके चैंबर के आगे तबादलों को लेकर अफसरों यहां तक विधायक भी लाईन में लगे देखें जाने के समाचार देखने को मिले। यही कारण था कि दिल्ली दरबार में गुहार लगाकर मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने उनसे छुटकारा पा लिया। यदि गृह जिले झुंझुनूं की बात करें तो कमोबेश भाजपा के प्रति समर्पण भाव रखने वाले कार्यकर्ताओं का यही दर्द है। यहां नजारा कुछ अलग है, जिला संगठन पर आयातित नेताओं से घिरा हुआ है। यही दर्द यहां के कार्यकर्ताओं और नेताओं का है कि न संगठन में और न सरकार में उनकी सुनवाई होती है।

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