गोबिन्द राखो अपणी ओट,
काम-क्रोध भये बट पारे, ताकि मारैं उर चोट॥ वैरी पंथ सबल सँग मेरे, मारग रोक रहे। काल अहेड़ी बधिक ह्वै लागे, ज्यों जिव बाज गहे॥ ज्ञान-ध्यान हिरदै हरि लीना, संग ही घेर रहे। समझ न परई बाप रमैया, तुम बिन शूल सहे॥ शरण तुम्हारी राखो गोविन्द, इन सौं संग न दीजे। इनके संग बहुत दुःख पाया, दादू को गह लीजे॥ अर्थात काम, क्रोध आदि शत्रु मेरे परमार्थ मार्ग में प्रतिबन्धक हो रहे हैं। इनके कारण मेरे हृदय में बाण चुभने के समान पीड़ा हो रही है। पांचो इन्द्रियों के जो शब्द स्पर्श आदि पाँच विषय हैं, वे भी मेरे परमार्थ मार्ग में अवरोधक बने हुए हैं। जैसे बधिक मृग को मारने के लिये पीछे-पीछे दौड़ता है, वैसे ही यह काल भी मुझे मारने के लिये दौड़ रहा है। जैसे बाज पक्षी चिड़ियों को पकड़ने के लिये दौड़ता है, वैसे ही यह काल मुझे भी पकड़ रहा है। हे हरे ! ज्ञान-ध्यान साधन भी काम-क्रोध के भय से अन्दर ही गुप्त हो रहे हैं अर्थात् इनको मैं नहीं धारण कर सकता। काम-क्रोध आदि चोर मेरे विवेक को हरण करने के लिये उद्यत हो रहे हैं। मेरे को कभी कामी व क्रोधी बना रहे हैं। इनके विनाश का मैं कोई उपाय भी नहीं जानता। हे प्रभो! आपके बिना मैने बहुत दुःख सहे हैं। अब मैं इनका संग नहीं चाहता हूँ। अत: मेरे को आप अपनी शरण में रखो। इन दुष्टों ने मुझे बहुत दुःख दिया है। अब कृपा करके मुझे अपनी शरणागति प्रदान करें। श्रीवैष्णवभागवत में-हे शरणागतों की पीड़ा को नष्ट करने वाले प्रभो ! मैं आपका दास हूँ और इस संसार-समुद्र में पड़ा हुआ हूँ। ऐसी वाणी सुनते ही जिनका मन द्रवित होकर दया से भर जाता है क्योंकि उनकी कृपा की कोई सीमा नहीं है। हे जगदीश ! मैं आपका दीन-दास हूँ मेरी रक्षा करो। केवल आप ही मेरे रक्षक बनो, ऐसी हृदय से निकली हुई वाणी का भगवान् निरन्तर पालन करते रहते है।