राइ रे राइ रे सकल भवनपति राइ रे, अमृत देहु अधाइ रे॥ परगट राता परगट माता, परगट नूर दिखाइ रे राइ। सुस्थिर ज्ञानां सुस्थिर ध्यानां, सुस्थिर तेज मिलाइ रे राइ॥ अविचल मेला अविचल खेला, अविचल जोति समाइ रे राइ। निहचल बैनं निहचल नैनां, दादू बलि बलि जाइ रे राइ॥ हे परमेश्वर आप त्रिभुवन के जो अधिपति कहलाते हैं, उनके भी आप स्वामी हैं। आप मुझे दर्शन देकर तृप्त कीजिये। प्रकट होकर आप अपने स्वरूप को दिखाइये, जिससे मैं भी आपके स्वरूप के दर्शन करके आप के स्वरूप में लीन हो जाऊं। ज्ञान ध्यान देकर अपने तेजोमय रूप में लीन कर दीजिये, जिससे मैं निश्चल आनन्द का अनुभव करता रहूं। ऐसी कृपा कीजिये, जिससे आपके निश्चल स्वरूप में मेरी मन की वृति स्थिर हो जाय। मेरी वाणी भी आपके निश्चल स्वरूप का गुण गान करे, नेत्रों से भी मैं आपके निश्चल स्वरूप का ही दर्शन करूं। अहो ! मैं बार वार चरणों में मस्तक झुका कर दर्शन की भिक्षा मांग रहा हूँ कि मुझे दर्शन दीजिये। श्वेताश्वतर में लिखा है कि- वही परमात्मा समय पर ब्रह्माण्डों की रक्षा करने वाला, समस्त जगत् का अधिपति, समस्त प्राणियों में छिपा हुआ है, जिसमें महर्षिगण देवता लोग भी ध्यान द्वारा संलग्न हैं। उस परमेश्वर को इस प्रकार जान कर मनुष्य मृत्यु के बन्धनों को काट देता है।
3/related/default