सतगुरु कीया फेरी करि, मन का औरै रूप। दादू पँचौ पलटि करि, कैसे भये अनूप।। संतप्रवर ब्रह्मऋषि श्रीदादूदयाल जी महाराज कहते हैं कि जिस पर गुरु की अनुकंपा होती है, वह ज्ञान के द्वारा मनुष्य बन जाता है। प्रायः ज्ञान के बिना सभी मनुष्य पशु तुल्य है। महात्मा कविवर संतश्रीसुंदरदास जी महाराज ने कहा है कि किसी भी साधक को सद्गुरु के बिना ज्ञान एवं ध्यान का मार्ग नहीं मिल पाता, न वह गुरु के बिना आत्मविचार में ही प्रवृत्ति हो सकता है। जैसे किसी सच्चे पथप्रदर्शक के बिना मार्ग ज्ञान नहीं हो पाता, वैसे ही गुरु के बिना किसी भी साधक को सन्मार्ग में प्रवृत्ति नहीं हो सकती।
बोधसागर में लिखा है कि हे गुरुदेव ! हम तारने योग्य आपके शिष्य है, ज्ञानरुपी नौका आपके पास है, पार करने योग्य यह संसार सागर है, आप पार कराने वाले किरदार है। अतः हम आप की शरण में आए हैं, हम आपको प्रणाम करते हैं ।