मानवीय संवेदना वह आंतरिक भावना है, जो एक दूसरे व्यक्ति के दुख, दर्द व पीड़ा को महसूस करके उसके प्रति करूणा व सहायता के लिए प्रेरित करती है। यह एक स्वस्थ, संगठित और संवेदनशील समाज व परिवार का आधार है, जिसके बिना मानवीय रिश्तों और सह अस्तित्व की कल्पना भी नही की जा सकती। आधुनिकता और अर्थ की अंधी दौड़ के कारण आज परिवार और समाज में संवेदनशीलता कम हो रही है, जिससे रिश्ते व पारिवारिक मूल्य कमजोर हो रहे हैं। भारतीय परिवार में पिता की मुख्य भूमिका आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने वाली, मार्गदर्शन देने वाली और संरक्षक वाली होती है। पिता की संरक्षक वाली भुमिका का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपनी इच्छाओं को मारकर बेटों व बेटियों की खुशी में ही खुद की खुशी मान लेता है। आर्थिक युग में बुढापे में पिता को अकेला छोड़ना एक बहुत बड़ी सामाजिक और नैतिक समस्या है। आधुनिक जीवनशैली, भागदौड़ और पैसों की भूख ने रिश्तों की गर्माहट कम कर दी है। एकल परिवार व हम की जगह मैं ने स्थान लेने से परिवार में बुजुर्ग मां बाप के लिए जगह कम हो गई है। अकेलापन बुजुर्गों को डिप्रेशन में ले आता है। समय पर दवा व देखभाल न मिलने से स्थिति और भी विकराल हो जाती है। जिन कंधों पर बैठकर अपने बाल्यकाल से जवानी की देहलीज तक गये, वहीं कंधे उनको बोझ लगने लगते हैं। पारिवारिक और मानवीय संवेदनाएं आज की तेज रफ्तार जिंदगी, भौतिकवादी दौड़ और सोशल मिडिया पर बढती निर्भरता के कारण कही पीछे छूट गई है। जो पिता अपने बेटे-बेटियो की जरूरत का अंदाजा उनकी आंखों से लगा लेता था व उनकी वहीं जरूरतें पूरी करने में पूरी ताकत लगाकर उनको पूरी करता था, वहीं पिता बूढा हो जाने पर कातर नजरों से अपनी इच्छाओं को मारकर उन दिनों को याद करते कोने में बैठकर रोते हुआ नजर आता है। जिस मां ने अपने बेटे की उन्नति और बुलंदी को लेकर मंदिरो की चौखट को नहीं छोड़ा, आज वही मां उनको बोझ लगने लग जाती है। उपरोक्त संदर्भ में यदि देखे तो सामाजिक, पारिवारिक व मानवीय संवेदनाओं का मृतप्राय होने का एक ज्वलंत उदाहरण देखने को मिला। राजस्थान की राजधानी जयपुर के त्रिवेणी नगर इलाके में एक बहुत ही भावुक और मानवीय संवेदनाओ को झकझोर देने वाला प्रकरण सामने आया। एक 90 वर्षीय रिटायर्ड प्रिंसिपल अपने फ्लेट में अकेले रहते थे। उनके परिवार में तीन बेटे-बेटियां, बहू और दामाद होने के उनकी मौत के करीब तीन दिनों तक जानकारी नहीं मिली। यह उस वृद्ध पिता की मौत नहीं बल्कि उन मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं की मौत है, जिनके लिए हमारा स़नातन धर्म जाना जाता है।
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