मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम करोड़ों भारतीयों की अटूट आस्था का केन्द्र और भारतीय संस्कृति के प्राण है। इस नाम की आस्था इसी से प्रदर्शित होती है कि जब दो आदमी मिलते हैं तो राम राम उच्चारण से अभिवादन स्वीकार करते हैं। भगवान श्रीराम को किसी राजनीतिक दल की बपौती या चुनावी हथियार नहीं बनाना चाहिए। राजनीति अपनी जगह है लेकिन प्रभु श्रीराम की मर्यादा और आदर्श सभी को जोड़ने का संदेश देते हैं बांटने का नहीं। विपक्षी दलों का मानना है कि भाजपा ने वर्षों तक राजनीतिक लाभ के लिए राम के नाम का इस्तेमाल किया। उनका आरोप है कि आस्था के नाम पर जहां जबाबदेही या पारदर्शिता की बात आती है तो उसे राजनीतिक हमले के रूप मे पेश किया जाता है। इसके विपरीत भाजपा व हिंदुत्ववादी संगठनो का मत है कि राम उनके लिए चुनावी मुद्दा नहीं बल्कि अटूट आस्था का विषय है। उनका आरोप है कि जो दल कल तक भगवान श्रीराम के अस्तित्व पर सवाल उठाते रहे हैं, वे आज अपनी राजनीति चमकाने के लिए ऐसे मुद्दों पर बयानबाजी कर रहे हैं। विदित हो कांग्रेस ने अपनी तुष्टीकरण की राजनीति के चलते भगवान श्रीराम को काल्पनिक माना था व जब राम मंदिर बनने का सुप्रीम कोर्ट के आदेश से रास्ता साफ हो गया तो इनको सांप सूंघ गया था। सामाजिक विश्लेषको का मत है कि यदि राम मंदिर जैसे सार्वजनिक महत्व और भारी दान वाले संस्थानों में पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। निष्पक्ष जांच की मांग को आस्था पर हमला मानने के बजाय, संस्थागत शुचिता के लिए उठाया गया कदम मानना चाहिए। राम मंदिर में दान चोरी का मुद्दा पूरे देश में छाया हुआ है। देश के इलैक्ट्रिक मिडिया हाउस इस मुद्दे को लेकर अपने अपने हिसाब से मिडिया ट्रायल कर रहे हैं लेकिन बहस देखकर देश का आवाम खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है कि बहस राम मंदिर के दान चोरी प्रकरण को लेकर रखी गई थी लेकिन इसमें चोरी प्रकरण पर सार्थक बहस कहीं भी दिखाई नहीं देती और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिलते है। कुछ मिडिया हाउस के एंकर अपने शब्द बहस करने वाले के मुंह में ठूंसने की नाकाम कोशिश करते नजर आ रहे हैं। विषय यह नहीं कि दान चोरी को लेकर किस राजनीतिक दल ने खुलासा किया और उस दल के नेता रामभक्त है या नहीं बल्कि सवाल यह है कि इसकी जांच होने पर जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए कि कहीं बड़ी हस्तियों को बचाया तो नहीं गया है। चूंकी जांच अभी भी चल रही है और जांच दल का निष्कर्ष पर पहुंचने का इंतजार करना चाहिए। इसमे कोई संदेह नहीं कि धुआं वहीं उठता है, जहां आग लगने का अंदेशा हो। राजनीतिक दलों के नेताओ को टीवी पर बैठकर आरोप प्रत्यारोप करने के बजाय रामलला के मंदिर को ठेस न लगे इस पर सोचना होगा। भगवान श्रीराम ने मर्यादा का पालन करते हुए एक छोटी सी बात पर सीताजी का त्याग कर दिया था तो सत्तापक्ष को उनके त्याग का अनुसरण करते हुए इस चोरी प्रकरण की हर कोण से जांच करवाकर दूध का दूध और पानी का पानी करना चाहिए। हालांकि चोरी के समाचार मिलते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विशेष जांच दल गठित कर दिया था और प्राथमिक जांच में चोरी की पुष्टि हुई और आठ लोगों को दान चोरी के आरोप में जेल भेज दिया गया। इस मामले मे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा पर जो लोग प्रश्न चिन्ह खडे कर रहे हैं, उनमे कोई दम नजर नहीं आ रहा। जांच पूरी होने व जांच रिपोर्ट आने तक का इंतजार करना ही होगा ।
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