धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
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जो मती पीछे ऊपजै सो मति पहले होइ। कबहुं न होवै जीव दुखी, दादू सुखिया सोइ।।
संतप्रवर श्री दादू दयाल जी महाराज कहते है कि-कार्य के नष्ट होने पर जो सदविचार पैदा होता है, यदि कार्य आरंभ से पहले ही यह सुमति पैदा हो जाए तो जीव कभी भी दुखी नहीं होवे और सदा सुखी रहे।कठोपनिषद् में लिखा है कि, बीती हुई बात का सोच नहीं करना चाहिए। मूढ मनुष्य को हजारों स्थानों पर शोक करना पड़ता है और सैकड़ों जगह पर भयभीत होना पड़ता है लेकिन विद्वान पुरुष को कभी भी शोक नहीं करना पड़ता।
लिखा है कि जो पहले ही कार्य तथा उनके फलाफल का विचार कर कार्य करता है, वह विचारवान शूर और बुद्धिमान है अंत में उसको कोई दुख नहीं होता तथा जो कर्म करके फिर सोचता है, वह कायर और मूर्ख है कि मैंने बिना विचारे ही यह काम कर लिया, इस प्रकार अंत में पछताता है।

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