काकरोच आंदोलन व इलैक्ट्रिक पत्रकारिता पर उठते सवाल

AYUSH ANTIMA
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काकरोच आंदोलन और भारतीय इलैक्ट्रिक मिडिया के बीच का संबंध मुख्यधारा के मिडिया की भूमिका पर सवाल खड़े करता है। इस आंदोलन के कवरेज को लेकर पक्षपात, गोदी मिडिया बनाम स्वतन्त्र मिडिया की बहस और रिपोर्टरों के सामने आई चुनौतियों पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। देश ने अन्ना हजारे के आंदोलन को भी देखा है और उस समय मिडिया 24 घंटे रिपोर्टिंग में सक्रिय था। सबसे तेज सबसे पहले की अवधारणा के साथ धुआंधार रिपोर्टिंग कर रहा था, हालांकि उसमें धार कम थी लेकिन तत्कालीन सरकार के खिलाफ जहरीला धुआं ज्यादा था लेकिन काकरोच आंदोलन में मुख्यधारा का मिडिया पुलिस बेरिकेट्स के पीछे ही सिमट कर रह गया। पत्रकारिता लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में जानी जाती है। इसके मायने यह है कि निष्पक्ष, सार्थक व सटीक पत्रकारिता को अंजाम दिया जाए न कि सरकार जब कदमताल करें तो उसे मार्च पास्ट बताकर प्रचारित किया जाए। जब इलैक्ट्रिक मिडिया हाउस दौ हजार के नोट में नैनो चिप लगे होने को लेकर बताए कि इससे ब्लेक मनी को ढूंढने में बहुत सहायता मिलेगी तो इसे सरकार की चाटुकारिता की पराकाष्ठा ही कहा जायेगा। निष्पक्ष व सटीक पत्रकारिता यही है कि सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करने के साथ ही जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता दी जाए व सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं की तारीफ की जाए। जनता के मूलभूत मुद्दों को दरकिनार कर सरकारी एजेंडा चलाना पत्रकारिता नहीं बल्कि पत्तलकारिता है। टीवी चैनलों पर डिबेट देखकर लगता है कि सत्ता पक्ष के प्रवक्ता को आना ही नहीं चाहिए क्योंकि एंकर ही सत्ता पक्ष की भूमिका निभाते नजर आते हैं। चीख चीखकर अपने शब्दों को सामने वाले के मुंह में ठूंसना ही पत्रकारिता हो गई है। काकरोच आंदोलन मे इलैक्ट्रिक मिडिया हाउस के रिपोर्टरो के साथ मारपीट व दुर्व्यवहार किया गया, उसको किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। एक पत्रकार होने के नाते मैं इसकी कठोर शब्दों में निन्दा व भर्त्सना करता हूं क्योंकि लोकतंत्र के सजग प्रहरी के साथ ऐसा दुर्व्यवहार शुभ संकेत नहीं है लेकिन सिक्के के दूसरे पहलू को देखें तो इनको आत्ममंथन की जरूरत है कि आंदोलनकारियों ने उनके साथ ऐसा बर्ताव आखिर क्यों किया। जो एंकर इसको लेकर यह कहते हैं कि वो बीस साल से पत्रकारिता कर रहे है लेकिन पिछले दशक से शायद ही बीस सैकंड के लिए ही जनहित के मुद्दों पर बहस की हो। हिन्दू-मुस्लिम, पाकिस्तान व लोगो की धार्मिक भावनाओं को भड़काया गया है। बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे मुद्दे इनके लिए गौण हो गये। जब भी महंगाई और बेरोज़गारी की बात आती है तो पाकिस्तान से तुलना की जाती है। आज वही एंकर उनके रिपोर्टिंग करने वालों के साथ दुर्व्यवहार होने पर लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं कि यह हमला लोकतंत्र पर किया गया है लेकिन उनको अपनी गिरेबान में झांकना होगा कि क्या उनका चैनल लोकतांत्रिक मूल्यों को बरकरार रखे हुए हैं। देश में हर नागरिक को अपनी बात रखने व आंदोलन प्रदर्शन करने का अधिकार है लेकिन इसकी आड़ में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। जैसा कि इस आंदोलन में देखा गया है कि कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा अराजकता फैलाने का काम हुआ है। इनके साथ सरकार को कानून के तहत सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है व इसके साथ यह भी देखना होगा कि शांतिपूर्वक व निर्दोष व्यक्ति इसकी चपेट में न आने पाए।

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