विदेश मंत्रालय ने काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को लेकर विदेशी फंडिंग के आरोपों को लेकर कहा कि उनके पास इस मामले में साझा करने के लिए कोई जानकारी नहीं है। नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान विदेश मंत्रालय के अधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से जंतर मंतर पर चले प्रदर्शनों में विदेशी फंडिंग की भागीदारी को लेकर पूछे गये सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि इस मसले पर मेरे पास साझा करने के लिए जानकारी नहीं है। इस अधिकारी के बयान से साफ होता है कि सरकार के पास इन प्रदर्शनों के पीछे किसी तरह की विदेशी फंडिंग, वित्तीय सहायता या बाहरी संलिप्तता का कोई प्रमाणिक तथ्य या पुष्टि मौजूद नहीं है। इस आंदोलन को लेकर यदि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दोहरे चरित्र की बात करें तो पत्रकारिता को संदेह के कटघरे में खड़ा कर दिया है। इस आंदोलन को लेकर भी इलेक्ट्रॉनिक मिडिया ने वैसे ही बदनाम करने में पूरी ताकत लगा दी थी, जैसे पीछे के आंदोलनों में उसने किया, वहीं पुराना तरीका अपनाया गया कि आंदोलन को विदेशी फंडिंग मिली है। यह आंदोलन भारत के विकास को रोकने का एक षड्यंत्र है। टुकड़े टुकड़े गैंग आंदोलन के साथ खड़ा है। यदि देखा जाए तो इस आंदोलन को घर घर पहुंचाने में कथित इलैक्ट्रोनिक मीडिया का ही योगदान है, जिन्होंने इस आंदोलन को बदनाम करने में ऐसी घटिया टिप्पणी की। वैसे भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया राष्ट्रभक्ति के सर्टिफिकेट के लिए सरकार की तरफ से रजिस्टर्ड है लेकिन इसके विपरीत सरकार के मंत्रियों द्वारा आंदोलनकारियों से सीधा संवाद करना इस बात का सूचक था कि सरकार इस आंदोलन को हल्के में नहीं ले रही है। सरकार को आभास हो गया कि विदेशी फंडिंग और इसके पीछे विदेशी ताकतो का हाथ है, यह फंडा इस आंदोलन में कामयाब नहीं होगा, इसलिए सरकार टेबल पर चर्चा को राजी हुई। इस आंदोलन ने राजनाथ सिंह के इस मिथक को भी तोड़ा कि एनडीए सरकार में मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होते। इन सबके बावजूद कुछ मिडिया हाउस के एंकर अभी भी प्रमाणित करने में लगे थे कि इनको विदेशी फंडिंग मिल रही है। एआई तकनीक के इस आधुनिक युग में एक चैनल चीख चीख कर पुष्टि कर रहा था, जबकि विदेश मंत्रालय किसी भी विदेशी ताकतों की साज़िश व विदेशी फंडिंग को सिरे से खारिज कर चुका था। उस परिस्थिति में एंकर के पास कहां से सबूत आ गये, यह जांच का विषय है। एक कथित मिडिया हाउस के एंकर ने कहा कि इस आंदोलन में विदेशी नागरिक शामिल होकर भारत सरकार के खिलाफ उकसावे की कार्यवाही कर रहे है तथा कतर से जंतर मंतर के लिए बड़े पैमाने पर अनजान फूड आर्डर व फंडिंग पहुंच रही है। इलेक्ट्रॉनिक मिडिया के इसी दोगलेपन का शिकार उसके ग्राउंड रिपोर्ट हुए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारिकता का विशेष महत्व होता है लेकिन यह महत्व तभी विश्वसनीय होता है, जब पत्रकारिता तथ्यों पर आधारित हो न कि निजी हितों को साधने में एकतरफा हो। आधुनिक अर्थ की इस अंधी दौड़ में लोकतंत्र का यह पाया अर्थ के बोझ के नीचे दबकर गिरने की अवस्था में है क्योंकि जिस तरह कि इलैक्ट्रोनिक मीडिया पत्रकारिता कर रहा है, जनता का विश्वास उन पर से उठ गया है। सोशल मिडिया के इस दौर ने इलैक्ट्रोनिक मीडिया को इस आंदोलन को लेकर बेनकाब कर दिया है।
भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया काकरोच आंदोलन को लेकर संदेह के घेरे में
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July 26, 2026
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