डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रणेता: प्रो. डॉ. मधुमुकुल चतुर्वेदी

AYUSH ANTIMA
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डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिर्फ राजनेता नहीं थे। वो विद्वान, शिक्षक और राष्ट्रवादी चिंतक थे। उनकी विचारधारा 3 स्तंभों पर टिकी थी-भारत की एकता, सांस्कृतिक जड़ें और आत्मनिर्भर राष्ट्र। डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अनुसार "भारत राष्ट्र है, राज्य नहीं"। भारत को एक राष्ट्र बनाती है, उसकी 5000 साल पुरानी साझा संस्कृति, न कि संविधान या सीमा। उनके शब्दों में-"हमारी एकता का आधार गंगा-जमुनी तहजीब नहीं, राम-श्याम की साझा परंपरा है। ताजमहल से पहले हमारे पास अजंता-एलोरा है।" वो पश्चिमी "नेशन-स्टेट" के मॉडल के खिलाफ थे। वे मानते थे भारत "सिविलाईजेशनल स्टेट" है – जहां धर्म, भाषा, जाति अलग होकर भी "भारतत्व" एक है। इसी सोच को बाद में दीनदयाल उपाध्याय ने "एकात्म मानववाद" कहा। 1947 में जब देश का विभाजन हुआ, मुखर्जी ने उसका तीव्र विरोध किया। उन्होंने बंगाल विभाजन का विरोध किया। उन्होंने "यूनाइटेड बंगाल" की मांग की थी। जब वो न मानी गयी, तो कहा "बंगाल बंटेगा तो हिंदू बहुल इलाके भारत में रहेंगे"। उनके इसी विरोध के परिणाम स्वरूप आज कोलकाता भारत में है। धर्म के आधार पर बंटवारे को उन्होंने राष्ट्र के लिए खतरनाक बताया। उनका तर्क था – "आज पाकिस्तान धर्म के नाम पर बना है। कल भाषा, जाति के नाम पर भारत के 10 टुकड़े होंगे"। कश्मीर समस्या के समाधान हेतु उन्होंने नारा दिया-"एक राष्ट्र, एक विधान, एक प्रधान, एक निशान"। धारा 370 को वो "भारत माता के माथे पर घाव" कहते थे। मानते थे कश्मीर की समस्या का पूर्ण एकीकरण से ही समाधान होगा। वे 33 साल की उम्र में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। उनकी शिक्षा नीति के 3 प्रमुख सूत्र हैं। प्रथम-मातृभाषा में शिक्षा हो। अंग्रेजी जरूरी है, पर विज्ञान-गणित आदि विषय मातृभाषा में पढ़ो। उनके अनुसार "जो कौम अपनी भाषा में नहीं सोचती, वो गुलाम रहती है"। द्वितीय-विज्ञान और संस्कृति में सामंजस्य हो। आईआईटी खड़गपुर की नींव उन्होंने रखी पर साथ में कहा "वैज्ञानिक बनो, पर अपनी जड़ों को मत भूलो। लैब में न्यूटन पढ़ो, मंदिर में आर्यभट्ट को याद करो"। तृतीय-शिक्षा का लक्ष्य "रोजगार" ही नहीं "चरित्र निर्माण" भी हो। उनका मानना था कि डिग्री क्लर्क बनाने के लिए नहीं, राष्ट्र बनाने के लिए है। उनके अनुसार राज्य की मदद ली जाये पर राज्य पर निर्भरता उचित नहीं। नेहरू के "लाइसेंस-कोटा राज" से वो सहमत नहीं थे। उद्योग मंत्री रहते हुए उन्होंने हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट, चित्तरंजन लोकोमोटिव शुरू किए पर निजी क्षेत्र को भी बढ़ावा दिया। नारा: "सरकार व्यापारी नहीं, संरक्षक बने"। उन्होंने विदेशी पूंजी का विरोध नहीं किया पर साथ ही उनकी शर्त थी – "तकनीक आए, पर मालिकाना हक भारत का रहे"। वे कृषि और उद्योग में संतुलन चाहते थे, वे मानते थे कि भारत गांवों में बसता है। इसलिए उद्योग लगाओ, पर किसान को उजाड़ो मत। भारतीय सन्दर्भ में वो "धर्मनिरपेक्षता" शब्द को उचित नहीं मानते थे। वे कहते थे "भारत धर्मनिरपेक्ष नहीं, सर्वधर्म समभाव है"। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ होगा कि राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं। जबकि सर्वधर्म समभाव का भावार्थ है कि राज्य सभी धर्मों का सम्मान करे, पर अपनी सांस्कृतिक जड़ें न काटे। इसीलिए वे "हिंदू महासभा" में शामिल हुए, पर उनका हिंदुत्व "हिंदू बनाम मुस्लिम" नहीं था। उनके लिए सिंधु से समुद्र तक रहने वाला हर भारतीय हिन्दू है। उन्होंने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। इसके घोषणा पत्र के बिंदु आज भी भाजपा का आधार हैं। उनके अनुसार भारत अखंड और सांस्कृतिक रूप से एक है। लोकतंत्र में आस्था किन्तु पश्चिमी नकल ना होकर भारतीय मूल्यों पर आधारित।
समाजवाद में विश्वास पर सोवियत रूस वाला नहीं बल्कि "मानव केंद्रित अर्थव्यवस्था"। अहिंसा में आस्था पर अहिंसा का अतिरेक नहीं। "आत्मरक्षा के लिए शक्ति भी जरूरी"।
मुखर्जी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने नारा दिया: “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे”। मुद्दा था: जम्मू-कश्मीर को भारत में पूरी तरह एकीकृत करना, धारा 370 हटाना। 2019 में धारा 370 को हटा दिया गया। उन्होंने कहा था "बंगाल भारत का रहेगा"। 1971 में बांग्लादेश बना, पर पश्चिम बंगाल भारत में रहा। उन्होंने शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति के समन्वय की बता की। नयी शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा और कौशल पर जोर दिया गया है। उनका कहना था "आधुनिक बनो, पर अपनी जड़ें मत काटो। दुनिया से सीखो, पर अपनी पहचान मत खोओ"।
*सेवानिवृत्त आचार्य राजनीति विज्ञान*

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