मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं है। यह ध्वनि, संकल्प, भावना, अनुशासन और साधक के आचरण का मेल है। अनेक लोग प्रतिदिन मंत्र जप करते हैं, माला फेरते हैं और निर्धारित संख्या भी पूरी करते हैं, फिर भी उन्हें अपेक्षित फल दिखाई नहीं देता। तब मन में प्रश्न उठता है कि क्या मंत्र प्रभावहीन है या जप की विधि में कोई कमी रह गई है। वास्तविकता यह है कि केवल मंत्र बोलना ही मंत्र-साधना नहीं है। शुद्ध उच्चारण आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी साधक का तन, मन, आसन, संकल्प और व्यवहार है। मंत्र जप करते समय इन पांच नियमों का पालन किया जाए तो साधना अधिक प्रभावी और फलदायी बन सकती है।
*1. तन, मन और आसन की शुद्धि*
मंत्र जप प्रारंभ करने से पहले साधक का तन, मन और आसन शुद्ध होना आवश्यक है। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। संभव हो तो पूजा और जप के लिए अलग वस्त्र तथा अलग आसन रखें। जप से पहले स्वच्छ जल से तीन बार आचमन करें। प्रत्येक बार थोड़ा जल ग्रहण करते हुए क्रमशः मंत्र बोलें—ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः।*
इसके बाद—ॐ हृषीकेशाय नमः का उच्चारण करते हुए हाथों को शुद्ध करें, फिर आसन पर थोड़ा शुद्ध जल छिड़कें और मन में आसन की पवित्रता का भाव रखें। आचमन करते समय केवल शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि मन की शुद्धि का भी संकल्प करें। यह भावना रखें कि क्रोध, भय, ईर्ष्या, अहंकार और नकारात्मक विचार शांत हो रहे हैं। मंत्र जप के लिए भूमि पर सीधे बैठने के स्थान पर कुश, ऊन या स्वच्छ कपड़े के आसन का प्रयोग करना चाहिए। पूजा का आसन दूसरे सामान्य कार्यों में उपयोग न करें।
*2. श्रद्धा, विश्वास और सही संकल्प*
मंत्र का फल प्राप्त करने के लिए मंत्र, आराध्य देव और साधना के प्रति विश्वास होना चाहिए। केवल किसी के कहने पर या तुरंत लाभ पाने की इच्छा से किया गया जप अधिक समय तक टिक नहीं पाता। जप शुरू करने से पहले स्पष्ट संकल्प लें। संकल्प में अपना नाम, आराध्य देव, मंत्र की संख्या, जप की अवधि और उद्देश्य निश्चित किया जा सकता है। उद्देश्य सात्त्विक और कल्याणकारी होना चाहिए। किसी दूसरे को हानि पहुंचाने, नियंत्रित करने या पराजित करने के भाव से किया गया जप साधक के मन को ही अशांत कर सकता है। बार-बार मंत्र बदलना भी उचित नहीं है। कुछ दिन एक मंत्र और फिर दूसरा मंत्र अपनाने से मन की एकाग्रता टूटती है। एक मंत्र को नियमपूर्वक पर्याप्त समय देना चाहिए।
*3. निश्चित समय, स्थान और दिशा*
मंत्र जप में नियमितता सबसे महत्वपूर्ण है। प्रतिदिन एक निश्चित समय और निश्चित स्थान पर जप करने से मन जल्दी एकाग्र होने लगता है। प्रातःकाल, सूर्योदय के समय या संध्या का समय साधना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। साधक पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ सकता है। पूजा का स्थान शांत, स्वच्छ और व्यवस्थित होना चाहिए। मोबाइल, बातचीत और बार-बार उठने से साधना की लय टूटती है। एक ही स्थान पर नियमित जप करने से वहां आध्यात्मिक वातावरण बनता है। कुछ समय बाद उस स्थान पर बैठते ही मन स्वतः शांत होने लगता है।
*4. संख्या से अधिक भाव और एकाग्रता*
कई लोग मंत्र की संख्या पूरी करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उनका मन कहीं और भटकता रहता है। हाथ में माला चलती है लेकिन मन व्यापार, परिवार, विवाद और चिंताओं में उलझा रहता है। ऐसी स्थिति में संख्या तो पूरी हो जाती है, लेकिन मंत्र हृदय तक नहीं पहुंचता। कम संख्या में किया गया एकाग्र जप, बिना भावना के किए गए हजारों जप से अधिक उपयोगी हो सकता है। शुरुआत में मंत्र को धीमे और स्पष्ट स्वर में बोलें। अभ्यास होने पर उपांशु जप करें, जिसमें होंठ हिलते हैं लेकिन आवाज बहुत धीमी होती है। मानसिक जप सबसे सूक्ष्म माना जाता है, परंतु उसके लिए अधिक एकाग्रता चाहिए। माला से जप करते समय तर्जनी का प्रयोग न करें। सुमेरु को पार न करते हुए माला पलटकर पुनः जप करें।
*5. शुद्ध आचरण, सेवा और क्षमा-याचना*
यदि व्यक्ति मंत्र जप तो करता है लेकिन दिनभर असत्य बोलता है, दूसरों का अपमान करता है, क्रोध करता है और गलत कार्यों में लगा रहता है, तो मंत्र की ऊर्जा उसके जीवन में स्थिर नहीं हो पाती। साधना का प्रभाव व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। सात्त्विक भोजन, मधुर वाणी, माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान, जरूरतमंद की सहायता, गौ-सेवा तथा जीवों के प्रति दया मंत्र-साधना को शक्ति देते हैं। पूजा या मंत्र जप पूर्ण होने के बाद तुरंत आसन न छोड़ें। अपनी परंपरा के अनुसार “ॐ इन्द्राय नमः” तीन बार बोलते हुए पृथ्वी पर तीन बार थोड़ा-थोड़ा जल अर्पित करें। इसके बाद आराध्य देव से क्षमा-याचना करें कि उच्चारण, ध्यान, संख्या या विधि में कोई भूल हुई हो तो उसे क्षमा करें।
अंत में यह प्रार्थना कर सकते हैं—मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
मंत्र का फल केवल धन, नौकरी या इच्छा-पूर्ति के रूप में ही नहीं मिलता। मन का शांत होना, भय कम होना, क्रोध घटना, निर्णय शक्ति बढ़ना और गलत कार्यों से दूरी बनना भी मंत्र के प्रारंभिक फल हैं। इसलिए मंत्र को केवल जिह्वा से नहीं, बल्कि श्रद्धा, शुद्धता, अनुशासन और सदाचार से जपना चाहिए। जब मंत्र, मन और कर्म एक दिशा में चलने लगते हैं, तभी साधना का वास्तविक फल प्राप्त होता है।