धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
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दादू जे नाहिं सो सब कहै, है सो कहै न कोई। खोटा खरा परखिये, तब ज्यो था त्यौ ही होइ। संत शिरोमणि श्रीदादूदयाल जी महाराज कहते है कि संसार के लोग, जिसका मन तो अशुद्ध है लेकिन वेशभूषा से स्वच्छ लगता है, उनको देखकर कहते हैं कि यह महात्मा बहुत अच्छा है। देखो इसकी वेशभूषा कैसे सुंदर है लेकिन जिसका मन तो पवित्र है परंतु वेशभूषा साधारण है, उसको देख कहते हैं कि है कोई असाधु है, उसको साधु नहीं समझते। यह बाहरी परीक्षा निरर्थक है, सच्चे परीक्षक जब उसके भावो को देखकर परीक्षा करेंगे तो सारा भेद खुल जाएगा। पद्म पुराण में लिखा है कि, जो मनुष्य अपवित्र दुर्गंध युक्त पदार्थों के भक्षण में आनंद मानता है, बराबर पाप करता रहता है, रास्ते में घूम-घूमकर चोरी करता है, उसको विद्वान पुरुषों ने वंचक कहा है, साधु नहीं। लिखा है-जो संपूर्ण कार्यों से अनभिज्ञ है, समायोजित सदाचार का ज्ञान नहीं है वह मूर्ख वास्तव में पशु की है।

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