निवाई (लालचंद माली): अग्रवाल दिगम्बर जैन मंदिर में आचार्य सुन्दर सागर महाराज के सानिध्य में आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के दूसरे दिन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुपम संगम देखने को मिला। संगीतमय भजनों, भक्ति नृत्य और मंत्रोच्चार के बीच 300 इन्द्र-इन्द्राणियों ने सामूहिक रूप से 16 श्रीफल अर्घ्य समर्पित कर भगवान की आराधना की। विधान से पूर्व सौधर्म इन्द्र दिलीप जैन द्वारा आचार्यश्री के सानिध्य में भगवान पार्श्वनाथ, शांतिनाथ एवं सुमतिनाथ का विधिवत पंचामृत अभिषेक किया गया। इसके बाद संघ की माताजी के निर्देशन में सभी इन्द्र-इन्द्राणियों ने सामूहिक कलशाभिषेक कर मंगल आराधना की। जैन धर्म के प्रवक्ता सुनील भाणजा एवं हितेश छाबड़ा ने बताया कि विधान के अंतर्गत सकलीकरण, इन्द्र प्रतिष्ठा, आचार्य निमंत्रण, भूमि एवं मंडप शुद्धि सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं विद्वान पंडितों के निर्देशन में सम्पन्न हुईं। सभी श्रद्धालुओं ने देव, शास्त्र और गुरु की पूजा के साथ मंत्र जाप एवं सिद्धचक्र विधान की आराधना की। संजय एंड पार्टी के मधुर भजनों पर दिनेश चंवरिया, महावीर जैन, महेंद्र चंवरिया, सुशील-नीरा जैन, अशोक सिरस, नेमीचंद सिरस, शकुंतला भाणजा, पिंकी कठमाना, हेमा बनेठा, सावित्री झिलाई, शशि व उर्मिला सोगानी, उषा जैन, ब्रह्मचारी योगेन्द्र जैन, त्रिलोक रजवास, जितेंद्र जैन, सुनील बनेठा, महेंद्र कठमाना और मनोज पाटनी सहित अनेक श्रद्धालुओं ने भक्ति नृत्य प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इस अवसर पर आचार्य सुन्दर सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि भारत धर्मप्रधान देश है, जहां प्रत्येक धर्म और संप्रदाय में विधि-विधान का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म क्रियाओं से अधिक शुद्ध भावनाओं को महत्व देता है। भावना रहित क्रिया पूर्ण फलदायी नहीं हो सकती, लेकिन साधना की प्रारंभिक अवस्थाओं में विधि-विधान का अपना विशिष्ट स्थान है।
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा, "संसार की प्रत्येक आत्मा में भगवान बनने की शक्ति विद्यमान है। यदि मनुष्य अपने भीतर के गुणों को जागृत कर आत्मशुद्धि और साधना के मार्ग पर चले, तो वह भी परमात्मा पद को प्राप्त कर सकता है।" इस दौरान विष्णु बोहरा, हुकमचंद जैन, दिलीप बगड़ी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।