बीकानेर (मुकेश रामावत): महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय में प्रस्तावित उपाधि वितरण समारोह को लेकर अब सवालों का घेरा गहराता जा रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन के कुछ फैसलों को लेकर शिक्षाविदों और राजनीतिक हलकों में नाराजगी देखी जा रही है।
*नियमों पर उठ रहे हैं सवाल*
विश्वविद्यालय के नियमानुसार डिग्री वितरण की सूचना कार्यक्रम से कम से कम 45 दिन पहले जारी करनी होती है। छात्रों को भी 15 दिन पहले सूचना देना अनिवार्य है। साथ ही डिग्री छपाई के लिए टेंडर प्रक्रिया भी समय पर पूरी होनी चाहिए लेकिन सूत्रों के अनुसार अब तक न तो विधिवत अधिसूचना जारी हुई है और न ही छात्रों को सूचना भेजी गई है। डिग्री छपाई का टेंडर भी कार्यक्रम से महज कुछ दिन पहले तय किया गया है। ऐसे में 5-10 दिन में पूरी प्रक्रिया कैसे संभव होगी, इस पर संशय है।
*कार्यकाल पूरा होने पर भी फैसले*
जानकारी के अनुसार कुलगुरु प्रो.दीक्षित का कार्यकाल 7 अगस्त को समाप्त हो रहा है। राज्यपाल कार्यालय द्वारा तय मापदंडों में कहा गया है कि कार्यकाल समाप्त होने से 3 महीने पहले कुलगुरु बड़े नीतिगत निर्णय नहीं ले सकते। इस लिहाज से मई से ही उनके निर्णय लेने के अधिकार सीमित हो जाते हैं। बावजूद इसके समारोह को लेकर की गई तैयारियों पर उंगली उठ रही है। नए कुलगुरु के चयन के लिए सर्च कमेटी भी गठित की जा चुकी है, जिसकी अध्यक्षता केशवानंद कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरु कर रहे हैं।
*राजनीतिक और शैक्षणिक गलियारों में चर्चा*
विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों का कहना है कि समारोह के जरिए कुछ विशेष लोगों को मानद उपाधि देने की तैयारी है, जबकि विश्वविद्यालय की स्थापना में योगदान देने वाले कई लोग अब भी उपेक्षित हैं। एक वर्ग का आरोप है कि यह फैसला नियमों को दरकिनार कर जल्दबाजी में लिया जा रहा है। दूसरी ओर कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि राजस्थान की भाषा और संस्कृति से जुड़े लोगों की अनदेखी कर बाहर के व्यक्ति को मानद उपाधि क्यों दी जा रही है।
*विवादों में घिरा विश्वविद्यालय*
कुल मिलाकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के स्तर पर इस मामले को लेकर असहमति है। शिक्षाविदों का मानना है कि इस तरह की जल्दबाजी से विश्वविद्यालय की साख पर असर पड़ सकता है। अब देखना होगा कि प्रशासन इन सवालों का जवाब देकर नियमों के अनुसार समारोह आयोजित करता है या फिर विवाद और गहराता है।