*जेएलएन मार्ग की कीमती जमीन: रसूखदार नेता डकारना चाहते है 900 करोड़ मूल्य की सरकारी जमीन को

AYUSH ANTIMA
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जयपुर (महेश झालानी): जमीन घोटाले के लिए कुख्यात जयपुर मे वर्ल्ड ट्रेड पार्क के सामने स्थित कीमती जमीन को डकारने की गरज से सत्तारूढ़ पार्टी के कई महारथी मैदान में सक्रिय है। यद्यपि मामला अदालत में विचाराधीन है लेकिन जमीनखोर करीब एक हजार करोड़ की जमीन को हथियाने के लिए सक्रियता से प्रयत्नशील है। इस महाघोटाले की कड़ियां प्रशासनिक गलियारों से लेकर सत्ताधारी दल के कद्दावर नेताओं तक जुड़ती नजर आ रही हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने जेडीए के तत्कालीन जोन उपायुक्त और आरएएस अधिकारी बलवंत सिंह लिग्री को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। इधर, हाईकोर्ट की खंडपीठ ने दो दिन तक लगातार मैराथन सुनवाई करने के बाद मंगलवार को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसकी अगली सुनवाई 20 जुलाई को होगी। मामला जेडीए के आयुक्त के पास पहुंचा तो वे इस घोटाले की गंध से दंग रह गए। जांच में जो क्रोनोलॉजी सामने आई है, वह हैरान करने वाली है। वर्ष 2023 में जब तत्कालीन जोन उपायुक्त बलवंत सिंह लिग्री का तबादला आदेश जारी हो चुका था, तब पद से मुक्त होने से ठीक पहले उन्होंने कोर्ट में एक शातिराना मध्यस्थता प्रस्ताव' डाल दिया। बिना किसी राज्य सरकार की पूर्व अनुमति और बिना जेडीए कमिश्नर की लिखित मंजूरी के, लिग्री ने अपने स्तर पर ही करीब 17 हजार वर्गगज भूमि 'ग्रीन फायर प्रा. लि.' को और लगभग 6,200 वर्गगज भूमि 'रतन प्रभा जैन एवं अन्य' के नाम करने की अनाधिकृत सहमति दे दी। 
हद तो तब हो गई, जब कोर्ट को यह झांसा दिया गया कि इस सौदे को जेडीए कमिश्नर की हरी झंडी मिल चुकी है, जबकि फाइलों की जांच में ऐसा कोई अप्रूवल लेटर मिला ही नहीं। इसी झूठी सहमति का इस्तेमाल कर 9 सितंबर 2023 को लोक अदालत के जरिए 2015 के निरस्तीकरण आदेश को पलटवा दिया गया। क्या एक ब्यूरोक्रेट बिना किसी बड़े राजनीतिक संरक्षण के इतने बड़े घोटाले को अंजाम देने की हिम्मत कर सकता है, जवाब है—बिल्कुल नहीं। अंदरूनी और पुख्ता खोजी इनपुट्स बताते हैं कि इस बेशकीमती जमीन को हड़पने के लिए सत्तारूढ़ भाजपा के ही कई बड़े और कद्दावर नेता पर्दे के पीछे से पूरी तरह सक्रिय हैं। इन रसूखदार नेताओं ने संबंधित प्राइवेट पार्टियों और सोसायटी के साथ पहले ही अंडर-द-टेबल 'गुप्त अनुबंध' कर रखे हैं, यानी जमीन पर कब्जा मिलते ही मुनाफे का पूरा ढांचा पहले से तैयार था। इस खेल की पुष्टि लिग्री के रसूख से भी होती है। निलंबित आरएएस अधिकारी बलवंत सिंह लिग्री मौजूदा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह के करीब सवा दो साल तक विशिष्ट सहायक रह चुके हैं। मंत्री के दफ्तर में इतनी लंबी पैठ और बड़े नेताओं के वरदहस्त के दम पर ही इस अधिकारी ने नियमों को पैरों तले रौंदकर सरकारी खजाने को लूटने का दुस्साहस किया। यह पूरा विवाद बहुत पुराना है, जब 2003 में यह जमीन 'अपोलो ग्रीन फायर अस्पताल' के नाम आवंटित हुई थी। शर्तों के घोर उल्लंघन पर जेडीए ने दिसंबर 2015 में इसे निरस्त किया। इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के कार्यकाल में इस बेशकीमती जमीन को भू-माफियाओं से बचाने और जनता के हित के लिए इस पर पार्क विकसित कर दिया गया था। लेकिन रसूखदारों की गिद्ध दृष्टि इस पर लगातार बनी रही। घोटाले की बू आते ही जेडीए कमिश्नर ने दो महीने तक इसकी बाल की खाल निकाली और सरकार को एक-एक तथ्य भेज दिया। चौतरफा घिरी सरकार ने अब अपनी साख बचाने के लिए खुद महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद को पैरवी के मोर्चे पर उतारा है। लिग्री को सस्पेंड कर कार्मिक विभाग में पटक दिया गया है और जेडीए अब उनके खिलाफ कड़ा आरोप-पत्र (चार्जशीट) तैयार कर रहा है। आगामी 20 जुलाई को अदालत का जो भी रुख होगा, वह यह तय करेगा कि जयपुर की जनता का यह पार्क सुरक्षित रहेगा या फिर इसे उन सफेदपोश नेताओं के हवाले कर दिया जाएगा जिन्होंने गुप्त अनुबंधों के जरिए सरकारी संपत्ति की बंदरबांट की पूरी स्क्रिप्ट लिख रखी थी।

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