वैसे तो झुंझुनूं भाजपा संगठन बीमार अवस्था में था लेकिन वर्तमान जिलाध्यक्ष के मनोनयन के बाद यह आईसीयू में आ गया है। वर्तमान जिलाध्यक्ष शायद पुराने व निष्ठावान कार्यकर्ता व पदाधिकारीयो की लोकप्रियता को पचा नहीं पा रही तभी उनको पार्टी के कार्यक्रमों से दूर ही रखने का प्रयास रहता है। विदित हो उनके मनोनयन पर प्रदेश प्रवक्ता ने गंभीर सवाल खड़े किए थे कि वह उन मापदंडों को पूरा नहीं कर रही, जो एक जिलाध्यक्ष पद के लिए निर्धारित है। यहां तक उन्होंने झुंझुनूं जिलाध्यक्ष को पैराशूट जिलाध्यक्ष तक करार दिया था क्योंकि उनका आरोप था कि वर्तमान जिलाध्यक्ष का नाम पैनल में ही नहीं था। उनके इस सार्वजनिक पोस्ट को भाजपा प्रदेश नेतृत्व ने अनुशासनहीनता माना और प्रदेश प्रवक्ता को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। खैर, यह भाजपा प्रदेश नेतृत्व का विशेषाधिकार है कि किसको बाहर निकाले और किसको पद दे लेकिन झुंझुनूं जिलाध्यक्ष ने संगठन को जेबी संगठन में तब्दील कर दिया है। भाजपा के सरल एप पर जिले के दस मंडल अध्यक्षो के नाम है, जो प्रदेश नेतृत्व द्वारा मनोनीत है लेकिन झुंझुनूं जिलाध्यक्ष की हठधर्मिता कहे कि प्रदेश नेतृत्व के आदेश की अवहेलना करते हुए उनका नाम अभी पदाधिकारियों की टीम में घोषित नहीं किया है और उन्हें हटाने का हर संभव प्रयास कर रही है। जब प्रदेश प्रवक्ता की एक पोस्ट अनुशासनहीनता की श्रेणी में आती है तो जिलाध्यक्ष का प्रदेश नेतृत्व के आदेशों की अवहेलना घोर अनुशासनहीनता में आता है। जिलाध्यक्ष की हठधर्मिता का एक ज्वलंत उदाहरण प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष राखी राठोड़ के जिले के दौरे में देखने को मिला कि आयातित नेताओं को मंच प्रदान किया गया लेकिन महिला मोर्चा महामंत्री को मंच नहीं दिया गया। मंच साझा करने मे प्रोटोकॉल का उल्लघंन देखने को मिला। यह बैठक झुंझुनूं के प्रबुद्धजनों व पार्टी के कार्यकर्ताओं की थी लेकिन जिनका नाम प्रबुद्धजनों में आता है, उनको सूचना तक भी नहीं थी। जिलाध्यक्ष की हठधर्मिता का आलम है कि उनको इस आयोजन की सूचना देना ही मुनासिब नहीं समझा। उनकी मनमाने तरीके से कार्यशैली का एक ज्वलंत उदाहरण है कि पार्टी द्वारा मनोनीत जिला मिडिया प्रभारी के कार्यक्षेत्र को दरकिनार कर अपने चहेतों द्वारा मिडिया की कवरेज अखबारों में भेजने के उदाहरण भी देखने को मिले हैं। वैसे ही भाजपा जिले में खस्ताहाल में है। झुंझुनूं विधायक का जिलाध्यक्ष से छतीश का आंकड़ा जिले में चर्चा का विषय है। यदि समय रहते प्रदेश नेतृत्व ने संज्ञान नहीं लिया तो आने वाले समय में इसके दूरगामी दुष्परिणाम देखने को मिल सकते हैं व पंचायत, नगर निकाय चुनावों में इसकी छाया देखने को मिल सकती है, जो भाजपा प्रदेश नेतृत्व के लिए दुखदाई होगी।
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