आसनों में प्यारा आसन।
लगता मुझको वृक्षासन।।
जब जब हूं मैं इसको लगाती।
मन में शांति सी छा जाती।।
चारों ओर स्निग्धा छाती।
जीवंतता मुझे पास बुलाती।।
मेरी प्रखरता बढ़ाता ये आसन।
लगता मुझको वृक्षासन।
आसनों में प्यारा आसन।।
लगता मुझको वृक्षासन।।
जब मैं हाथ ऊपर उठाती।
ऊपर उठाकर हूं मिलाती।।
मन की उत्तकण्ठा दूर हो जाती।
चंचलता मानो गंभीरता लाती।।
मुझे स्थिरता देने वाला आसन।
प्यारा मेरा वृक्षासन।।
प्रतिदिन इसका अभ्यास कराती।
मुझमें ऊर्जा भरती जाती।।
नीरसता को दूर भगाती।
जिजीविषा मेरे समीप है आती।।
प्रकृति मुझे अपने पास बुलाती।
कलियां मंद मंद मुस्काती।।
ठंडी समीर मेरी सांसों में समाती।
मेरी संतुलनता बढ़ती जाती।।
मन देह को संतुलित करने वाला आसन प्यारा मेरा वृक्षासन।
आसनों में प्यारा आसन।
प्यारा मेरा वृक्षासन।।
*विश्व योग माह को समर्पित मेरी ये कविता*