जयपुर (महेश झालानी): राजस्थान में यदि कोई विभाग सबसे अधिक शक्तिशाली माना जाता है तो वह आबकारी विभाग है। शराब की एक-एक बोतल से लेकर हर ठेके की गतिविधियों पर उसकी निगाह रहने का दावा किया जाता है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि प्रदेशभर में रात आठ बजे के बाद शराब विक्रेताओं की जो मनमानी देखने को मिलती है, उसने पूरे प्रशासनिक ढांचे की पोल खोलकर रख दी है। कहने को कानून का राज है, लेकिन शराब कारोबारियों के लिए कानून शायद केवल किताबों में लिखा एक शब्द भर रह गया है। निर्धारित समय के बाद बिक्री बंद करने का नियम है, मगर राजधानी जयपुर सहित प्रदेश के अधिकांश शहरों में रात होते ही नियमों की खुलेआम शवयात्रा निकल जाती है। शटर गिरा दिए जाते हैं, लेकिन बिक्री जारी रहती है। कहीं पीछे के दरवाजे से शराब दी जाती है तो कहीं दीवारों में बनाए गए छोटे-छोटे छेदों से बोतलें बाहर पहुंचाई जाती हैं। डिजिटल इंडिया का कमाल यह है कि इन अवैध बिक्री केंद्रों पर ऑनलाइन भुगतान के लिए बाकायदा स्कैनर भी उपलब्ध हैं। जयपुर की हवा सड़क स्थित एक शराब दुकान इसका जीवंत उदाहरण है। दुकान में बनाया गया छोटा सा छेद इस बात का प्रमाण है कि अवैध बिक्री कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि सुनियोजित व्यवस्था है। सवाल यह है कि जब यह सब आम आदमी देख सकता है तो आबकारी विभाग के अधिकारी क्यों नहीं देख पाते या फिर वे देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। सबसे बड़ी जिम्मेदारी वित्त विभाग की है क्योंकि आबकारी विभाग उसी के अधीन कार्य करता है। वित्त सचिव को बताना चाहिए कि यदि हर रात नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं तो विभागीय निगरानी व्यवस्था आखिर कर क्या रही है। सवाल यह है कि क्या उनके पास ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं पहुंचती या फिर रिपोर्ट पहुंचती है और फाइलों में दफन कर दी जाती है। वित्त मंत्री को भी जनता के सामने जवाब देना चाहिए। सरकार हर साल हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का दावा करती है, लेकिन क्या राजस्व संग्रह ही विभाग का एकमात्र उद्देश्य है, क्या कानून का पालन करवाना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यदि नियम तोड़ने वाले ठेकेदारों पर कार्रवाई नहीं होती तो जनता यह मानने के लिए स्वतंत्र है कि सरकार की प्राथमिकता कानून नहीं बल्कि केवल राजस्व है। सबसे ज्यादा सवाल आबकारी आयुक्त के हिस्से में आते हैं। प्रदेश की पूरी आबकारी व्यवस्था उनके नियंत्रण में है। यदि राजधानी में ही खुलेआम नियमों का मखौल उड़ाया जा रहा है तो यह उनकी प्रशासनिक विफलता नहीं तो और क्या है। क्या कभी रात के समय औचक निरीक्षण किए गए, कितने ठेके निलंबित हुए, कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई। यदि जवाब शून्य है तो फिर यह मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि विभाग का भय पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
स्थिति केवल अवैध बिक्री तक सीमित नहीं है। समय-समय पर जहरीली शराब से मौतों की खबरें भी सामने आती रही हैं। इसके बावजूद विभाग की सक्रियता केवल कागजी नजर आती है। जनता के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हुई है कि रिश्वत की मोटी रकम मिलने के बाद अधिकांश अनियमितताओं पर पर्दा डाल दिया जाता है। सरकार चाहे इस धारणा को गलत बताए, लेकिन उसे गलत साबित करने के लिए कार्रवाई भी तो करनी होगी।
मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा कानून के राज की बात करते हैं। यदि वास्तव में कानून का राज स्थापित करना है तो सबसे पहले शराब माफिया और उसे संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर शिकंजा कसना होगा। रिश्वतखोरी में अव्वल आबकारी विभाग के कान मरोड़े जाए, वरना जनता यही समझेगी कि प्रदेश में सरकार का नहीं, बल्कि शराब कारोबारियों का राज चल रहा है। रात आठ बजे के बाद खुलने वाली हर अवैध खिड़की, हर गुप्त छेद और हर बजता हुआ क्यूआर स्कैनर सरकार की प्रशासनिक विफलता का सार्वजनिक प्रमाण बन चुका है।