समय की धूल जमी है अब, संभलने का है समय आया।
मनुज ने लोभ के वश में,
प्रकृति को बहुत दुख पहुँचाया।।
जहाँ थे कल हरे-भरे वन,
वहाँ अब कंक्रीट के घर हैं।
नदी का जल भी दूषित हुआ, हवा में विष का ही असर है।।
ठंडी छाया वाले वृक्षों की,
जगह अब धुआं ले गया।
पक्षियों का जो चहकना था, वह शोर में कहीं खो गया।।
धरती माँ आज तड़प रही है, मांगती तुमसे प्यार है।
जगाओ चेतना मन में अब,
कि यही अंतिम द्वार है।।
एक पौधा तुम आज लगाओ, इसे अपना कर्तव्य बनाओ।
नदियों को तुम स्वच्छ रखो और प्लास्टिक को दूर भगाओ।।
स्वच्छ होगी जब हवा-पानी, और खिलेंगे सुंदर सुमन।
तभी सुरक्षित रहेगा अपना, यह प्यारा सा संसार-चमन।।
आओ मिलकर प्रण यह लें हम, धरा को फिर से सजाएंगे।
पर्यावरण की रक्षा करके,
एक नया कल लाएंगे।।
यह धरती है जीवन हमारा,
इसे न हम अब खोने देंगे।
खुशहाल बनाएंगे इस वसुधा को, हम सुखद स्वप्न बोएंगे।।
*अन्नपूर्णा सोनी (टैक्स कंसलटेंट)*
कृष्णा चैरिटेबल फाउंडेशन, जयपुर