रियायती सरकारी जमीन आवंटन बनाम जनहित

AYUSH ANTIMA
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राज्यों में निजी अस्पतालों और विश्वविद्यालयो को रियायती और सस्ती सरकारी जमीन आवंटन करने की नीति का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं का विस्तार करना है। कालखंड में शेखावाटी के भामाशाहों ने बिना सरकारी जमीन अधिग्रहण किए अनेक स्कूल, कालेज व अस्पताल बनवाकर अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए लेकिन आधुनिकता की इस अंधी दौड़ ने सामाजिक सरोकारों को ताक पर रख दिया व अस्पतालों व विश्वविद्यालयों को खोलने की आड़ में सरकारी जमीन को कोड़ियो के भाव अधिग्रहण कर लेते हैं। सरकारी जमीन सस्ते दामों पर अधिग्रहण को लेकर पारदर्शी प्रक्रियाओं का पालन करना होता है ताकि इसका सीधा लाभ आमजन व जरूरतमंद लोगो को मिल सके। अस्पतालों को लेकर यह प्रक्रिया अपनाई जाती है तो यह अनिवार्य होता है कि बीपीएल मरीजों या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के मरीजों को मुफ्त या सस्ती दरों पर इलाज हो व उनके लिए बैड आरक्षित हो। इसी क्रम में जो विश्वविद्यालय खोलने के लिए सरकारी जमीन हथियाते है तो उन‌ निजी शिक्षण संस्थाओं और विश्वविद्यालयो को वंचित व जरूरतमंद छात्रों के लिए निर्धारित आरक्षित सीटें निशुल्क शिक्षा हेतु आरक्षित रखनी होती है। यदि उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में झुंझुनूं जिले के एक निजी विश्वविद्यालय को देखा जाए तो वो विश्वविद्यालय किसी भी मापदंड पर खरा नहीं उतरता है। यह निजी विश्वविद्यालय संदेहों के घेरे में होने से अपनी गुणवत्ता की शिक्षा को लेकर चर्चित न होकर शिक्षा का बेचान और फर्जीवाड़े को लेकर काफी चर्चित है। इस निजी विश्वविद्यालय को अगले पांच साल के लिए पीएचडी पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए यूजीसी ने प्रतिबंधित कर दिया है। विदित हो यूजीसी को शिकायत मिली थी कि यह निजी विश्वविद्यालय अखबार या मंदिर के प्रसाद की तरह पीएचडी की डिग्रीयां बांट रहा है। इस धोखाधड़ी के गोरखधंधे में करीब 100 से 150 करोड़ का धन संग्रह करने का अनुमान है। आंकड़ों के अनुसार ये निजी विश्वविद्यालय सन् 2016 से 2025 के बीच करीब 4000 डिग्रियों की बंदरबांट कर चुका है, जिसका मूल्य 3 लाख से 5 लाख तक वसूलने की खबरें हैं। शिक्षा के नाम पर है न मजे वाला धंधा, हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा आये। अब सवाल उठता है कि यूजीसी ने इसको आगामी पांच साल के लिए पीएचडी पाठ्यक्रमों को लेकर प्रतिबंधित तो कर दिया लेकिन जो 4000 डिग्रियों की बंदरबांट कर दी वे पीएचडी डिग्रीधारी कहीं न कही हमारी शिक्षा की गुणवत्ता को पलीता लगा रहे हैं। क्या सरकार को उनकी जांच कर उन डिग्रियों को भी निरस्त नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही शिक्षा के नाम पर जो अनैतिक व्यापार हो रहा है तो क्या सरकार को रियायती दरों पर की गई भूमि को दुबारा सरकार के अधीन नहीं ले लेनी चाहिए क्योंकि जिस मकसद को लेकर सरकार ने इस निजी विश्वविद्यालय को जमीन दी थी, वो विश्वविद्यालय उस मकसद में कामयाब नहीं हो पाया और इस विश्वविद्यालय को एक उद्योग का रूप दे दिया गया। वैसे इस विश्वविद्यालय का विवादों से चोली दामन का साथ रहा है। विश्वविद्यालय में संचालित ब्लड बैंक भी विवादों में रहा है। स्थानीय राजनीतिक स्तर पर ब्लड बैंक को लेकर सवाल उठाए गये थे, जहां इसके संचालन और प्रशासनिक कार्यों को लेकर विवाद की स्थिति बनी थी।

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