धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
By -
0

कुछ चेत रे कहि क्या आया। इनमें बैठा फूल करते देखी माया॥ तू जनि जानैं तन धन मेरा, मूरख देखि भुलाया। आज काल चलि जावैदेही, ऐसी सुन्दर काया॥ राम नाम निज लीजिये, मैं कहि समझाया। दादू हरि की सेवा कीजै, सुन्दर साज मिलाया॥ हे जीव ! तू कुछ तो चेत। जब तू गर्भ में वास कर रहा था तब तूने क्या प्रतिज्ञा करी थी। "हे प्रभो ! इस गर्भ में रहते मैं बहुत दुःखी हो गया हूँ, मुझे जल्दी गर्भ से बाहर करो। मैं आपका अब भजन ही करूंगा।" किन्तु तू तो गर्भ से बाहर आते ही माया को देखकर मोहित हो गया और विषय-भोगों में आसक्त हुआ अपनी प्रतिज्ञा को भी भूल गया। यह शरीर धन आदि जो ममता कारक पदार्थ हैं, इनमें से तेरा एक भी नहीं होगा, ऐसा समझ। यह जीव भी तेरे शरीर को त्याग कर आजकल में ही चला जायगा। अत: कल्याण के लिये राम नाम का जप कर। बार बार तेरे को समझाता हूं कि जिसने तेरे को यह शरीर दिया है, उसी भगवान् को भज। आदि-पुराणमें लिखा है कि हे कौन्तेय, दृढ मन से राम के नामों को जपो क्योंकि नाम का जपने वाला मुझे प्रिय है। अत: हे अर्जुन, तुम भी नाम जपो। संसार में ऐसा कोई मन, वचन, कर्म जनित पाप नहीं है, जो कलियुग में मेरे नाम कीर्तन से नष्ट न हो। इसलिये नाम को जपो। समस्त ब्रह्माण्ड तथा इन्द्रादि देवता विनष्ट हो जाते हैं, कल्याण भक्ति युक्त मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!