सवाल यह नहीं कि कारवां किसने लूटा, सवाल यह है कि कारवां क्यों लूटा गया। यह बहुत ही गहरा और सोचनीय विषय है क्योंकि इस बात पर तो चर्चा हो रही है कि कारवां लूटा गया लेकिन उन तथ्यों को छुपाया जा रहा है कि कारवां क्यों लूटा गया। जब कोई बड़ा नुकसान या चोरी होती है तो चोरों को दोषी ठहराया जाता है। असली सवाल को नजरअंदाज किया जाता है कि जो लोग मार्गदर्शक बने बैठे थे, उन्होंने कारवां की रक्षा क्यों नही की। यह तो वही बात हो गई कि कौवा कान ले गया, कौवे के पीछे भाग रहे हैं, कान को कोई नहीं देख रहा। जब संस्था, सरकार या नेतृत्व की विफलता और उसकी जबाबदेही कटघरे में खड़ी होती है तो उपरोक्त सवाल पूछा ही जायेगा। यह उस व्यवस्था या सिस्टम से सवाल किया जायेगा कि आखिर कमियां कहां रह गई कि आमलोगों की चढ़ावे की पूंजी पर डाका डाला गया। सनातनियो के आराध्य देव मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के मंदिर में चढावे पर डाका डाला गया। इसको लेकर एसआईटी का गठन हुआ व उसकी रिपोर्ट के बाद आठ लोगों को गिरफतार किया गया। यह पैसे, सोने व चांदी की लूट नहीं बल्कि उन करोड़ों लोगों की आस्था व विश्वास पर डाका है। इस आस्था पर हुए डाके को इतना हल्के में ले लिया कि इनको पुलिस कस्टडी में लेने के बजाय न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। गिरफ्तारी के तुरंत बाद चंपतराय व अनिल मिश्रा ने ट्रस्ट के पदों से इस्तीफा दे दिया। चंपतराय श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव पद पर विराजमान थे। महासचिव बतौर उनकी ज़िम्मेदारियो में दान संग्रह, प्राप्त चढ़ावे की सुरक्षित व उसके प्रबंधन की जिम्मेदारी भी उनके अधिकार क्षेत्र में आती थी। जब मंदिर के चढ़ावे की बंदरबांट हो रही थी तो यह कतई संभव नहीं था कि किसी अपने आका के बिना इस डकैती को अंजाम दे सके। बिना किसी आका के संरक्षण बिना वह गिरफ्तार व्यक्ति इस इतनी बड़ी डकैती नहीं कर सकते। यह तो उस आका के मोहरे थे, जो पर्दे के पीछे छिपा सब कुछ देख रहा था। मुख्यमंत्री योगी का यह कहना कि दूध का दूध और पानी का पानी होगा लेकिन अब यह लगता है कि दूध और पानी को ही अलग कर दिया है। उनकी कार्यवाही को लेकर वह कहावत याद आती है कि कौवा कान ले गया तो लोग कान को नहीं देख रहे, कौवे के पीछे भाग रहे हैं। श्रीराम मंदिर किसी की निजी संपत्ति नहीं, जैसा कि कुछ प्रभावशाली लोगों ने इस पर एकाधिकार जमा लिया है। इसके निर्माण में एक रिक्शा चालक का भी रामसेतु के निर्माण में गिलहरी के योगदान जैसा है। इन प्रभावशाली लोगों ने गिलहरी के उस योगदान को तुच्छ मानकर अपनी निजी संपत्ति समझने लगे व इसकी आड़ में डाका डाला गया। चंपतराय का इस्तीफा होना काफी नहीं, वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
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