पता ही नहीं चला कि,
विश्वास कहाँ चला गया।
इधर देखा, उधर देखा,
पर कहीं नहीं मिला।
पहुँचे जब पानी की प्याऊ पर,
तो लोटा रस्सी से बंधा मिला।
देखा जब बैंक में नजारा,
तो पैन भी बंधा था
लिए धागे का सहारा।
कहीं पर स्टेपलर बंधा दिखा,
तो कहीं शौचालय का मग बंधा था।
ढाबे की कुर्सियाँ और खाट बंधी थीं,
ऐसा लगा जैसे हर तरफ,
अविश्वास की ही डोर बंधी थी।
वास्तव में हम इतने अविश्वासी हो गए,
कि धीरे-धीरे विश्वास को ही खा गए।
जिधर भी अब नजर दौड़ाई,
उधर मायूसी के बादल छा गए।
काश! कोई ईमानदारी की डोर से बंधा होता,
त्याग और समर्पण की कोई समझ पाता परिभाषा।
कोई नेह की डोर को आगे खींच ले जाता,
तब इस धरा पर...
अनमोल विश्वास का दीप जरूर जगमगाता।
दूर होता तब यह गहरा अविश्वास,
और फिर से पावन विश्वास का गीत लिखा जाता।