सीकर (राजेन्द्र शर्मा झेरलीवाला): इस पावन अवसर पर श्रीमद्जगतगुरु श्री रामानुजाचार्य लोहार्गल सूर्य मठ मंदिर सूर्यकुंड पीठाधीश्वर महंत स्वामी अवधेशाचार्य जी महाराज ने अधिक मास में आई सोमवती अमावस्या धार्मिक और पुण्य प्राप्त करने को लेकर कहा कि सनातन संस्कृति, साधना और आत्मशुद्धि का दिव्य पर्व "यत्र धर्मः, तत्र जयः" — सनातन परम्परा का प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम और लोकमंगल का संदेश लेकर आता है। उन्हीं महान पर्वों में से एक है सोमवती अमावस्या, जिसका अधिक मास में आगमन अत्यन्त पुण्यदायक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष फलदायी माना गया है। सनातन धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित है और अमावस्या तिथि पितृ-तर्पण, दान, जप एवं तप की तिथि मानी गई है। जब अमावस्या सोमवार के दिन आती है, तब उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है और यदि यह पावन संयोग अधिक मास में प्राप्त हो जाए, तो इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। अधिक मास को शास्त्रों में "पुरुषोत्तम मास" कहा गया है। यह ऐसा समय है जब मनुष्य सांसारिक व्यस्तताओं से कुछ समय निकालकर आत्ममंथन, ईश्वर-भक्ति, सत्संग, जप, दान और सेवा के माध्यम से अपने जीवन को अधिक पवित्र और सार्थक बनाने का प्रयास करता है। यह मास हमें बताता है कि जीवन की वास्तविक समृद्धि धन-संपत्ति में नहीं, बल्कि सदाचार, संस्कार और ईश्वर के प्रति समर्पण में निहित है।
सोमवती अमावस्या का महत्व
शास्त्रों के अनुसार इस दिन प्रातःकाल पवित्र नदी अथवा तीर्थ में स्नान, भगवान शिव एवं भगवान विष्णु का पूजन, पीपल वृक्ष की परिक्रमा, पितरों का स्मरण तथा यथाशक्ति दान-पुण्य करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। यह पर्व हमें अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और समाज के प्रति सेवा-भाव का संदेश देता है। सोमवती अमावस्या का मूल भाव यही है कि मनुष्य अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार और नकारात्मकता का त्याग कर सत्य, करुणा और धर्म के मार्ग पर अग्रसर हो। आज जब भौतिकता और भागदौड़ के बीच मानवीय संवेदनाएँ क्षीण होती जा रही हैं, ऐसे समय में सनातन के ये पर्व हमें परिवार, संस्कृति और अध्यात्म से जोड़ने का कार्य करते हैं। यह अवसर केवल व्यक्तिगत पूजा-अर्चना तक सीमित न रहे, बल्कि समाज में सेवा, गौ-संरक्षण, वृक्षारोपण, अन्नदान, जलसेवा और जरूरतमंदों की सहायता जैसे लोकहितकारी कार्यों का भी संकल्प लिया जाए। अधिक मास में आई सोमवती अमावस्या का यह दिव्य संयोग हम सभी के लिए आत्मशुद्धि, धर्मपालन और लोककल्याण का संदेश लेकर आया है। आइए, इस पावन अवसर पर हम अपने ऋषियों, देवताओं और पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए सनातन संस्कृति के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लें।