गुजर रहा था किसी राह से,
नजर पड़ी एक पीपल की ओर।
था वो मुरझाया अलसाया,
देख रहा था मेरी ओर।
उसकी आंखें पथराई थी,
कांप रहा था, अंग अंग उसका।
मैंने उससे पूछ ही डाला,
हे पीपल देव! तुमने अपने चेहरे पर मायूसी का कंबल क्यों डाला। सुनकर उसकी आंखें भर आई थी, उसने मुझे सारी हकीकत बताई थी।
था मुझ पर खूब बसेरा,
गिद्ध, मोर, काग ने डाला था डेरा। आज तीनों ही कम नजर आते हैं, पूछा कई राहगीरों से
लेकिन कोई नहीं बताते हैं।
हूँ बिल्कुल तन्हाई में,
अपने मन की गहराई में।
क्या रखा है इन बातों में,
दर्द मिला है प्रकृति को
इस मानव के हाथों से ।
अगर चेतना इनमें न आ पायेगी,
तो वो दिन दूर नहीं
जब मानवता काल कलवित हो जाएगी। आओ अनमोल अलख जगाते हैं, बना रहे प्रकृति का संतुलन, जन-जन में यह संदेश फैलाते हैं।