पीपल की पुकार

AYUSH ANTIMA
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​गुजर रहा था किसी राह से,
नजर पड़ी एक पीपल की ओर।
था वो मुरझाया अलसाया,
देख रहा था मेरी ओर।
​उसकी आंखें पथराई थी,
 कांप रहा था, अंग अंग उसका।
मैंने उससे पूछ ही डाला,
हे पीपल देव! तुमने अपने चेहरे पर मायूसी का कंबल क्यों डाला।​ सुनकर उसकी आंखें भर आई थी, उसने मुझे सारी हकीकत बताई थी।
था मुझ पर खूब बसेरा,
गिद्ध, मोर, काग ने डाला था डेरा। ​आज तीनों ही कम नजर आते हैं, पूछा कई राहगीरों से
लेकिन कोई नहीं बताते हैं।
हूँ बिल्कुल तन्हाई में,
अपने मन की गहराई में।
​क्या रखा है इन बातों में,
दर्द मिला है प्रकृति को
इस मानव के हाथों से ।
अगर चेतना इनमें न आ पायेगी,
तो वो दिन दूर नहीं
जब मानवता काल कलवित हो जाएगी। ​आओ अनमोल अलख जगाते हैं, बना रहे प्रकृति का संतुलन, जन-जन में यह संदेश फैलाते हैं।

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