मैं ऐतबार न करता तो क्या करता?

AYUSH ANTIMA
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जीवन विश्वास की नींव पर खड़ा है। यदि विश्वास न हो तो रिश्ते, समाज, व्यापार, राजनीति और यहां तक कि पारिवारिक जीवन भी टिक नहीं सकता लेकिन विडम्बना यह है कि आज के समय में सबसे अधिक चोट भी विश्वास पर ही होती है। जब कोई व्यक्ति छल करता है, तो अक्सर उसकी सफलता इस बात पर निर्भर नहीं होती कि उसका झूठ कितना बड़ा है, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि वह उसे कितने सलीके से कहता है। वर्तमान समय सूचना और संचार का युग है। हर दिन हमारे सामने अनगिनत दावे, वादे और संदेश आते हैं। सोशल मीडिया पर फैलती खबरें हों, विज्ञापनों में किए जाने वाले दावे हों या फिर राजनीति के मंचों से दिए जाने वाले आश्वासन—हर जगह शब्दों का आकर्षक जाल बिछा हुआ दिखाई देता है। कई बार बातें इतनी प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत की जाती हैं कि सत्य और असत्य के बीच का अंतर समझना कठिन हो जाता है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति विश्वास कर लेता है, तो उसे पूरी तरह दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
रिश्तों में भी यही स्थिति देखने को मिलती है। मित्रता, पारिवारिक संबंध और सामाजिक व्यवहार—इन सबका आधार विश्वास है। जब कोई अपना व्यक्ति आश्वस्त करता है, भरोसा दिलाता है और पूरी आत्मीयता से बात करता है, तो स्वाभाविक रूप से मन उसके शब्दों को स्वीकार कर लेता है। आखिर हर समय संदेह लेकर जीना भी तो संभव नहीं है। यदि हम हर व्यक्ति की हर बात पर शंका करने लगें, तो जीवन का सहज प्रवाह ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए विश्वास करना मनुष्य की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी मानवीयता का प्रमाण है। हालाँकि, इसका अर्थ यह नहीं कि विवेक को त्याग दिया जाए। विश्वास और अंधविश्वास के बीच एक महीन रेखा होती है। अनुभव हमें सिखाता है कि केवल शब्दों के आधार पर निर्णय लेने के बजाय तथ्यों और व्यवहार को भी परखना चाहिए। किसी व्यक्ति का चरित्र उसके वचनों से कम और उसके कर्मों से अधिक प्रकट होता है। इसलिए जीवन में विश्वास आवश्यक है, लेकिन उसके साथ सजगता भी उतनी ही आवश्यक है। समाज के स्तर पर भी यह प्रश्न महत्वपूर्ण है। जब बार-बार विश्वास टूटता है, तो लोगों के मन में अविश्वास बढ़ने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि सामाजिक एकता और पारस्परिक सहयोग कमजोर पड़ने लगते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति और संस्था की जिम्मेदारी है कि वह अपने आचरण में सत्यनिष्ठा बनाए रखे। विश्वास अर्जित करना कठिन है, लेकिन उसे खोना बहुत आसान है। यही कारण है कि विश्वास और विश्वासघात का प्रश्न आज पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है।
 हम अक्सर उन लोगों पर भरोसा कर लेते हैं जो अपने शब्दों को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करना जानते हैं। बाद में जब सच सामने आता है, तो पीड़ा होती है। फिर भी यह याद रखना चाहिए कि विश्वास करना अपराध नहीं है, छल करना अपराध है। जीवन का सौंदर्य इसी में है कि हम विश्वास करने की क्षमता को जीवित रखें, लेकिन उसे विवेक की रोशनी से दिशा भी देते रहें। क्योंकि यदि दुनिया में विश्वास समाप्त हो जाए, तो संबंध केवल औपचारिकताएँ बनकर रह जाएंगे। इसलिए कभी-कभी धोखा खाने के बाद आत्ममंथन करना भी जरूरी हो जाता है ताकि वही त्रुटि पुनः न दोहराई जाए। ऐसे क्षणों में एक शायर की पंक्तियाँ अनायास स्मरण हो आती हैं कि—वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से, मैं ऐतबार न करता तो क्या करता।

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