राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों को लेकर न्याय पालिका व विधायिका में टकराव

AYUSH ANTIMA
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राजस्थान में पंचायत व नगर निकाय चुनावों को लंबे समय तक टालने की राजस्थान सरकार की नीति को लेकर न्याय पालिका व विधायिका के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। माननीय हाईकोर्ट ने सरकार की दिसम्बर तक चुनाव करवाने की मांग को खारिज करते हुए 31 जुलाई तक हर हाल में चुनाव करवाने के सख्त निर्देश दिए हैं। माननीय हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लंबे समय तक नहीं टाला जा सकता है।‌ न्यायालय ने राजस्थान सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि 31 जुलाई तक चुनावी प्रक्रिया पूरी करने को सुनिश्चित करें। चुनाव टालने को लेकर विधायिका यानी भजन लाल शर्मा सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग ने गर्मी, प्रशासनिक परिसीमन और अन्य पिछड़ा आयोग की आरक्षण की रिपोर्ट लंबित होने का हवाला देते हुए चुनाव प्रक्रिया दिसम्बर तक टालने की मांग की थी। अदालत ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए ओबीसी आयोग को 20 जून तक अपनी रिपोर्ट पेश करने और 31 जुलाई तक हर हाल में चुनाव सम्पन्न करवाने के आदेश दिए। इस मामले में याचिकाकर्ता ने सरकार पर जान बूझकर चुनाव टालने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि राज्य सरकार पिछले डेढ़ साल से पंचायत और नगर निकाय चुनाव करवाने से बच रही है। न्यायालय के इस ताजा आदेश से सरकार पर चुनाव करवाने को लेकर दबाव बढ़ गया है। इन चुनावों व अदालत के आदेश के बाद भजन लाल शर्मा सरकार के मंत्रियों के अलग अलग बयान आ रहे हैं। मंत्री झाबर सिंह ने इस आदेश को राज्य चुनाव आयोग के पाले में डाल दिया है। अजमेर में एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने जो निर्णय लिया है, उसके कियान्वयन का दायित्व राज्य निर्वाचन आयोग का है। पंचायत और नगर निकाय चुनावों के लिए निर्वाचन आयोग जो भी सरकार से सहयोग की मांग करेगा, हमारी सरकार निर्वाचन आयोग का पूरा सहयोग करेगी। चुनाव टालने को लेकर विपक्षी कांग्रेस पार्टी सरकार पर हमलावर है कि भजन लाल शर्मा सरकार अपनी हार को देखते हुए चुनावों का सामना करने से कतरा रही है और इनको टालने के लिए नित नये हथकंडे अपना रही है। सूत्रों की मानें तो भजन लाल शर्मा सरकार अदालती आदेश को लेकर कानूनी विशेषज्ञो की राय लेकर सुप्रीम कोर्ट में जाने की तैयारी कर रही है। चुनावों को टालने को लेकर भजन लाल शर्मा सरकार की उन जन कल्याणकारी नितियों पर प्रश्न चिन्ह खड़े होते हैं, जिनको लेकर रथ यात्राएं निकाली जा रही है। जब सरकार ने जनहित के अनगिनत कार्य किए है तो चुनावों से क्यों पीठ दिखा रही है।‌ मंत्री का राज्य निर्वाचन आयोग के पाले में गेंद डालना अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से भागने के समान है।

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