कलम की ताकत' या 'जिम्मेदारी से कन्नी

AYUSH ANTIMA
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बीकानेर: सरकारी दफ्तरों में फाइलों का वजन अक्सर सच्चाई को दबा देता है, लेकिन जब मामला सीधे तौर पर 'फर्जीवाड़े' और 'लापरवाही' के पुख्ता सबूतों से जुड़ा हो, तो एक हस्ताक्षर भी विभाग की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर देता है। ताजा मामला बीकानेर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय से जुड़ा है, जहाँ से जारी एक आदेश ने प्रशासनिक संवेदनशीलता की पोल खोलकर रख दी है।
*अधिकारी की सर्विस बुक पर सवाल*
प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि एक जिम्मेदार अधिकारी का कर्तव्य केवल फाइलों को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि उनकी सत्यता की जांच करना है लेकिन किशन गोपाल छंगाणी के मामले में जो आदेश जारी हुआ है, वह किसी 'न्याय' की तरह नहीं, बल्कि 'जिम्मेदारियों से पल्ला झाडऩे' जैसा प्रतीत होता है। आरटीआई के दस्तावेजों में फर्जी हस्ताक्षर, गायब अनुबंध और बिना रेफरेंस नंबर के नियुक्ति पत्रों का काला चिट्ठा खुल चुका है। इसके बावजूद, सीएमएचओ द्वारा यह कहना कि "अनुभव प्रमाण पत्र में कोई तकनीकी खामी नहीं है", उनकी सर्विस बुक पर एक ऐसे 'लाल स्याही' के धब्बे के समान है, जिसे भविष्य में मिटाना मुश्किल होगा।
*फर्जीवाड़े को मौन स्वीकृति*

जब सूचना के अधिकारी में दिए गये दस्तावेज के सबूत चीख-चीख कर अनियमितताओं की गवाही दे रहे हैं, तब एक उच्च पदस्थ अधिकारी का इन सबूतों को दरकिनार करना उनकी निष्पक्षता पर 'खतरनाक' सवाल खड़ा करता है। अनुभव प्रमाण पत्र में संशोधन से इनकार करना केवल एक व्यक्ति के करियर के साथ खिलवाड़ नहीं है, बल्कि यह विभाग की उस सड़ चुकी कार्यप्रणाली का प्रमाण है, जहाँ सत्यापन महज एक कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है। परिवादी का कहना है कि अगर विभाग अपनी गलतियों को सुधारने के बजाय उन्हें 'क्लीन चिट' देने में व्यस्त है, तो मामला अब बीकानेर से जयपुर तक के न्यायालयों और उच्च स्तरीय जांच एजेंसियों की चौखट पर खटखटाने को तैयार है। उन्होंने कहा कि सरकारी कुर्सी पर बैठकर हस्ताक्षर करने वाले साहब को यह याद रखना चाहिए कि फाइलों पर स्याही तो सूख जाती है, लेकिन लापरवाही के साक्ष्य कभी नहीं मिटते। यदि इन दस्तावेजों की उच्च स्तरीय जांच होती है, तो आज का यह 'बचाववादी' आदेश कल संबंधित अधिकारी के लिए 'सर्विस रिकॉर्ड' का सबसे काला अध्याय साबित हो सकता है। क्या विभाग इन लापरवाह अधिकारियों पर नकेल कसेगा या फिर 'सत्यापन' के नाम पर यह फर्जीवाड़ा यूं ही जारी रहेगा।

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