लगती है कल की सी बात
सब कुछ बदल सा गया
लगता है अब वो दौर
बहुत दूर तक चला गया
मोटा पहनना मोटा खाना था
सयुंक्त परिवार हुआ करते थे
वो कितना सुंदर जमाना था
आदमी को आदमी देखकर
बड़ा खुश होता था
कहां बिठाएं क्या खिलाएं
यह सोचता रहता था
कृष्ण सुदामा के जैसी
मित्रता हुआ करती थी
एक दूजे का समर्पण था
भावों को समझने की
समझ हुआ करती थी
अब सब कुछ
उलट-पलट हो गया
फास्ट फूड खाना
जीवन का स्टेटस हो गया
एकल परिवार एक परिपाटी हो गई, मां-बाप भी बोझ लगने लगे
जीवन की अजीब झांकी हो गई
अब आदमी को आदमी देखकर, ईर्ष्या भाव में जीता है
क्यों बढ़ रहा है, कोई आगे
मन ही मन कुढ़ता है, मित्रता में भी स्वार्थ नज़र आता है
अब एक दूसरे के भाव
कौन समझना चाहता है
काश! अनमोल वो दिन फिर आये। आदमी को आदमी देखकर फूलों की तरह खिल जाए।