राजस्थान मे मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के नेतृत्व में डबल इंजन सरकार आगामी महीने में सत्ता का आधा सफर पूरा कर रही है। सत्ता के इस आधे सफर के पूरा होने के बाद मंत्रिमंडल के पुनर्गठन की सुगबुगाहट होना निश्चित है। जून माह में इस बदलाव या पुनर्गठन को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि आगामी चुनावों के मध्यनजर संगठन को सुदृढ़ करने के साथ ही क्षेत्रीय व जातीय संतुलन को कायम रखा जा सके। वर्तमान में कैबिनेट में मुख्यमंत्री सहित 24 मंत्री हैं, जबकि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार मंत्रिमंडल में अधिकतम मंत्रियों की संख्या 30 हो सकती है, यानी सत्ता का आधा सफर तय करने के बावजूद मंत्रिमंडल में 6 पद खाली है। सूत्रों की मानें तो जो मंत्री आमजन व सरकार की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरे हैं, उनकी विदाई तय है, उनकी जगह नये चेहरों को शामिल किया जा सकता है। कुछ वरिष्ठ मंत्रियों के विभागों में फेरबदल कर कुछ को संगठन की जिम्मेदारी दी जा सकती है। मंत्रिमंडल में बदलाव या पुनर्गठन को लेकर राजनीतिक विश्लेषको का मानना है कि जहां पार्टी विगत विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई थी, उस क्षेत्र के विधायको की लाटरी लगना तय माना जा रहा है। यदि शेखावाटी अंचल की बात करें तो सीकर की सात सीटों में से तीन, चुरु की 6 सीटों में से 2 व झुन्झुनू की सात सीटों में से तीन सीट ही भाजपा की झोली में गई थी। गृह जिले झुंझुनूं की बात करें तो उपचुनाव में राजेन्द्र भांभू ने ओला परिवार के राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती देते हुए कांग्रेस के अजेय गढ़ में कमल खिलाने का काम किया था। सभी को साथ लेकर चलने वाले मृदुभाषी व सरल व्यक्तित्व के धनी राजेन्द्र भांभू की मंत्री पद को लेकर दावेदारी बनती है।
राजनितिक नियुक्तियों की बात करें तो बोर्ड व आयोगों में अभी करीब 52 से अधिक पद खाली है, पर राजनितिक नियुक्तियों की प्रकिया लंबित है, इन पदों को भी भरकर विधायको को राजी किया जा सकता है। इसके साथ ही सरकार व संगठन में संतुलन को देखते हुए पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करीबियों को भी मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। आगामी पंचायत व नगर निकाय चुनावों को देखते हुए मंत्रिमंडल व राजनीतिक नियुक्तियां होनी सरकार की मजबूरी है। वर्तमान में संगठन व सरकार में तालमेल की बात करें तो कार्यकर्ताओं की आम शिकायत है कि भाजपा के राज में भी उनके काम नहीं हो रहे, अफसर उनकी सुनवाई ही नहीं कर रहे। राजस्थान में अफसरशाही हावी होने को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सार्वजनिक मंच से अपनी गहरी नाराजगी व्यक्त कर चुकी है। वर्तमान में श्रीगंगानगर विधायक प्रकरण इस बात की पुष्टि करता है कि अफसर जब विधायको के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं तो आम कार्यकर्ता की बात सुनना या उनके काम के बारे में सोचना बेमानी होगा। अब यह तो आने वाला समय ही निर्धारित करेगा कि मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा किस तरह से भाजपा आलाकमान से मंत्रिमंडल में बदलाव या पुनर्गठन पर मुहर लगावाते है।