ज्यूं रचिया त्यूँ होइगा, काहे कौं सिर लेह। साहिब ऊपर राखियै, देख तमासा येह॥ ४८॥ संत शिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि जो भाग्य में भगवान् ने लिख दिया, वही होगा ऐसा निश्चय करके मैं कर्ता हूँ, आगे भी मैं ही करूंगा, ऐसा अभिमान मत कर। इसको त्याग दे, इस मिथ्या अभिमान को शिर पर ढोकर क्यों दु:खी हो रहा है। इसको त्याग कर अपने को अकर्ता मानकर संसार को देख हरिभजन कर, जिससे तू संसार में लिप्त न हो सकेगा। योग वासिष्ठ में हे राम ! जो कुछ बार-बार प्राप्त होने वाली संपत्तियां या आपत्तियां है, जो बाल्यकाल यौवन जरा मरण रूपी महान् संताप है, जो सुख दुःख की परंपरा रूप संसार सागर में गोता लगाया है। यह सब अज्ञान रूपी गाढ अन्धकार की विभूतियां है। अर्थात् ये सब आत्मा में अज्ञान में ही प्रतीत हो रही है।
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