जयपुर में इलाज नहीं, खुली डकैती चल रही है। जनसेवा का पवित्र चोगा पहनकर आए मेडिकल माफिया ने पूरी गुलाबी नगरी को अपनी बेरहम गिरफ्त में ले लिया है। यह उस खौफनाक और कड़वे धोखे की दास्तान है, जिसे सरकार की सरपरस्ती में अंजाम दिया जा रहा है। जिन रसूखदार व्यक्तियों, ट्रस्टों और संस्थाओं को कभी इस सूबे के नीति-नियंताओं ने केवल और केवल गरीबों के मुफ्त इलाज के संकल्प पर कौड़ियों के भाव (रियायती दरों पर) अरबों रुपए की सरकारी जमीनें खैरात में बांट दी थीं, आज उन्हीं जमीनों पर आम जनता को नोचने-खसोटने वाले आलीशान कसाईखाने खड़े हो चुके हैं।
जनसेवा का मुखौटा अब पूरी तरह उतर चुका है। पीछे छिपा है सिर्फ और सिर्फ बेकाबू मुनाफे का एक आक्रामक, क्रूर और अमानवीय चेहरा, जो गरीब की लाचारी और मध्यम वर्ग की मजबूरी को हर दिन सरेआम नीलाम कर रहा है। अस्पताल का मतलब कभी पीड़ित को राहत देना होता था, लेकिन आज जयपुर के ये नामी अस्पताल पांच सितारा होटलों की चकाचौंध को भी मात दे रहे हैं। संगमरमर के चमकते फर्श, मखमली सोफे, आलीशान लाउंज और फाइव-स्टार कमरे। यह चकाचौंध मरीज को ठीक करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी जेब पर कानूनी डकैती डालने के लिए तैयार की गई है।
इन आलीशान महलों के मुख्य गेट पर कदम रखते ही गरीब अपनी आर्थिक हैसियत देख लेता है। वह अंदर जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाता और गेट के बाहर ही दम तोड़ने को मजबूर हो जाता है। जिस मध्यम वर्ग को भ्रम है कि वह सुरक्षित है, उसका यह वहम भी पहली ही बिलिंग में टूट जाता है। आपातकालीन स्थिति का फायदा उठाकर मेडिकल माफिया ऐसा जाल बुनता है कि तीमारदार अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी सौंपने के बाद भी गिड़गिड़ाता हुआ बाहर निकलता है। बीमारी अब मजबूरी नहीं, इन कॉर्पोरेट लुटेरों के लिए 'जैकपॉट' बन चुकी है। जब इन संस्थाओं और ट्रस्टों को जमीनें दी गई थीं, तब आवंटन पत्रों में बड़े-बड़े वादे और कड़े नियम लिखे गए थे।
इसके तहत गरीबों के लिए एक निश्चित प्रतिशत बेड हमेशा आरक्षित रखने थे, ओपीडी और आईपीडी में निशुल्क या अत्यंत रियायती इलाज देना था और सामाजिक दायित्व के तहत जरूरतमंदों को मुफ्त दवाएं दी जानी थीं। आज इन शर्तों की धज्जियां सरेआम उड़ाई जा रही हैं। संतोषबा दुर्लभजी, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स, महात्मा गांधी, एटरनल, नारायणा, मनिपाल और सीके बिड़ला जैसे दिग्गज अस्पतालों का पूरा तंत्र सिर्फ और सिर्फ व्यावसायिक मुनाफे पर टिका है। क्या कोई भी अस्पताल सीना ठोककर यह डेटा सार्वजनिक कर सकता है कि उसने पिछले एक साल में कितने असली गरीबों का पूरी तरह मुफ्त इलाज किया, जवाब है— नहीं क्योंकि गरीबों के लिए आरक्षित बेड पर भी ये अस्पताल पिछले दरवाजे से 'प्रीमियम क्लास' के मरीजों को बैठाकर मोटी कमाई कर रहे हैं।
इस पूरे काले साम्राज्य का सबसे शर्मनाक और दुखद पहलू यह है कि सूबे का शासन और प्रशासन पूरी तरह से भांग खाकर सोया हुआ है। ऐसा लगता है कि सचिवालय से लेकर स्वास्थ्य भवन तक बैठे नीति-नियंताओं ने अपनी आंखें, कान और अंतरात्मा सब कुछ मेडिकल माफिया के पास गिरवी रख दी है। साल 2020 में नगरीय विकास विभाग ने एक जांच का ढोंग रचा था। निकायों और विकास प्राधिकरणों से रिपोर्ट मांगी गई थी लेकिन छह साल बीत जाने के बाद भी वह रिपोर्ट फाइलों की धूल चाट रही है। जनता की अरबों-खरबों की जमीनें इन निजी घरानों को खैरात में बांट दी गई, लेकिन सरकार आज तक इनसे एक पाई का हिसाब नहीं मांग सकी। सरकार की यह रहस्यमयी चुप्पी चीख-चीख कर गवाही दे रही है कि सिस्टम की रगों में मेडिकल माफिया का रसूख और पैसा पानी की तरह बह रहा है। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए। इन अस्पतालों की जमीन सरकार की है। इनका बुनियादी ढांचा सरकारी टैक्स छूट की मलाई से खड़ा हुआ है। जब इनमें मरीज आते हैं, तो वे भी 'आरजीएचएस' (RGHS) जैसी सरकारी योजनाओं के जरिए आते हैं, जिसका अरबों रुपए का भुगतान सीधे सरकारी खजाने से होता है। इसके बावजूद ये अस्पताल फर्जी क्लेम उठाने और वित्तीय अनियमितताएं करने से बाज नहीं आते। यानी हर तरफ से मार सिर्फ और सिर्फ आम जनता पर पड़ रही है। लागत जनता की, संसाधन जनता के, लेकिन मलाई सिर्फ इन सफेदपोश लुटेरों की जेब में जा रही है। यह रिपोर्ट सोई हुई सरकार और इस अंधे सिस्टम की छाती पर कुछ नुकीले सवाल दागती है।
* पहला सवाल यही है कि सरकार कब तक भांग खाकर सोने का नाटक करेगी और क्या कभी उन अस्पतालों की जमीनों का आवंटन रद्द होगा, जिन्होंने गरीबों के मुफ्त इलाज की शर्तों को कचरे के डिब्बे में डाल दिया है।
* दूसरा सवाल यह कि क्या सरकार में इतनी राजनीतिक इच्छाशक्ति है कि वह एक श्वेत पत्र जारी कर जनता को बताए कि कौड़ियों के भाव दी गई जमीनों के बदले में जनता को वास्तव में क्या मिला।
* तीसरा यह कि जब पूरा इलाज सरकारी खजाने और योजनाओं के भरोसे चल रहा है, तो फिर इन पांच सितारा होटलों को मुनाफाखोरी की खुली छूट क्यों दी गई है। जयपुर की जनता अब इस 'मेडिकल लूट' को पहचान चुकी है। जनसेवा के नाम पर खड़े किए गए ये साम्राज्य वास्तव में आम आदमी के खून-पसीने की कमाई पर पल रहे हैं। अगर सरकार अब भी अपनी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागी, तो इतिहास इस खामोशी को 'मेडिकल माफिया' के साथ की गई सबसे बड़ी प्रशासनिक साठगांठ के रूप में दर्ज करेगा।