अतिक्रमण हटाना एक प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों, सड़कों और फुटपाथो को आमजन के लिए सुरक्षित करने के साथ ही जाम जैसी समस्या से निजात दिलाना भी है लेकिन इसकी आड़ में प्रशासन द्वारा गरीबों को परेशान करना व राजनीति करना बिल्कुल अनुचित व अन्याय पूर्ण है। यह कार्यवाही रेहड़ी-पटरी वालों के जीवनयापन को बुरी तरह प्रभावित करती है। इनके लिए बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था किए ऐसी कार्यवाही अमानवीय कृत्य की श्रेणी में आती है। ऐसी कार्यवाही में यह भी देखा गया है कि प्रभावशाली व राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोगों को नजरंदाज कर दिया जाता है। अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही पारदर्शी, निष्पक्ष व मानवीय होनी चाहिए न कि राजनीति से प्रेरित या बदले की भावना से प्रेरित होनी चाहिए।
जिला मुख्यालय पर स्थित गांधी चौक पर अतिक्रमण का मुद्दा हर तीन चार महीने बाद अपना फन उठा लेता है। प्रशासन इसको लेकर मशक्कत करता नजर आता है लेकिन प्रशासन की इस कसरत का हश्र वही ढाक के तीन पात वाला नजर आता है। यहां लगने वाली रेहड़ी-पटरी वाले हैंड टू माउथ होते हैं, इसको लेकर भी प्रशासन को सोचना होगा कि इनकी रोजी रोटी पर कोई आंच न आए, इनको कोई स्थायी जगह देने की जरूरत है, जैसे प्राइवेट बस स्टेंड को तत्कालीन कलेक्टर ने अपने प्रयासों से अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया था। रेहड़ी-पटरी वाले भी इसी समाज के अंग है, उनकी दिक्कतों को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। इस मुद्दे को लेकर प्रशासन की दो चार दिनो तक खुलने वाली नींद इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। शहर को सौंदर्यीकरण की आड़ में उनके मौलिक अधिकार रोजी रोटी को छीनना भी जनहित में नही आता। स्थानीय प्रशासन व विधायक को इसमें संवेदनशीलता का परिचय देते हुए कोई स्थायी समाधान ढूंढने के प्रयास होने चाहिए। इसके लिए पुराना बस स्टैंड सबसे उपयुक्त स्थान हो सकता है, जो गांधी चौक से कोई ज्यादा दूरी पर भी नहीं है। पुलिस प्रशासन को भी चाहिए की सौंदर्यकरण व अतिक्रमण की आड़ में इनको परेशान न किया जाए। रेहड़ी-पटरी वालों को भी प्रशासन को इस मामले में मदद करनी चाहिए क्योंकि हठधर्मिता टकराव को जन्म देती है।