डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बंगाल में 74 साल बाद भगवा

AYUSH ANTIMA
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देखा जाए तो बंगाल का चुनावी माहौल बहुत ही तनावपूर्ण रहा। एक तरफ ममता बनर्जी का अजेय गढ़ व दूसरी तरफ भाजपा की आक्रामक रणनीति थी। इन चुनावी परिणामों को देखकर यह स्पष्ट हो चुका है कि डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बंगाल में 74 साल बाद भगवा का परचम लहराया जाना तय है। चुनावों को लेकर भाजपा की जो ऐतिहासिक जीत हुई है, उसका विश्लेषण करना जरूरी हो जाता है। विपक्ष द्वारा 90 लाख वोटों को हटाने के साथ ही चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए हैं। टीएमसी की हार का मुख्य कारण सत्ता का अहंकार व जमीनी स्तर से जुडाव टूटना रहा। 15 साल के शासन के बाद सत्ता विरोधी लहर के साथ टीएमसी कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी व भ्रष्टाचार के लगे आरोपो के मध्यनजर ममता अपनी सत्ता बचाने में सफल नहीं रही। ममता बनर्जी जिस महिला वोट बैंक के बलबूते पर राजनीति करती थी, उस वर्ग में असुरक्षा की भावना ने टीएमसी को हार की तरफ धकेल दिया।
देखा जाए तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विचारधारा पर वामपंथी विचारधारा का बोलबाला था। बंगाल में हमेशा हमार बांग्ला को प्राथमिकता दी व भाजपा को सदैव बाहरी पार्टी माना गया। यही कारण था कि जनसंघ व उसके बाद भाजपा बंगाल में अपने पैर नहीं जमा पाई। बंगाल में आज भगवा का उदय डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विचारधारा व भारतीय संस्कृति के रक्षक के तौर पर देखा जा रहा है। भाजपा की नई सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक हिंसा की संस्कृति को खत्म करना और लोकतांत्रिक गरिमा को बहाल करना होगा। डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी की वैचारिक विरासत को आगे बढाते हुए बंगाल में भाजपा सरकार का गठन भगवा रंग में रंगा बंगाल के रूप में देखा जा रहा है। यदि देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैलियों और अन्य राजनीतिक गतिविधियों के दौरान बड़ी संख्या मे लोग भाजपा से जुड़े, जिससे भगवा लहर ने ममता के किले को ध्वस्त कर दिया। भाजपा की यह जीत अभूतपूर्व व ऐतिहासिक भी है। इसके साथ ही हिन्दुत्व आधारित विकास के एजेंडे की संस्कृति का संकेत भी है। इन चुनावी परिणामों में विकास, कानून व्यवस्था और केन्द्रीय योजनाओं को लागू करने के वादे ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की राजनीति पर भारी पडे। भाजपा की इस जीत को हिन्दुत्व की विचारधारा और चेतना जाग्रत की महत्वपूर्ण छाप के रूप में देखा जा रहा है। बंगाल में भाजपा के समर्थक इस जीत को नये बंगाल की क्रान्ति के रूप में देख रहे हैं। इन चुनावों में भाजपा की ऐतिहासिक जीत में हिन्दू समुदाय में सुरक्षा की भावना और संस्कृति की अस्मिता की रक्षा के मुद्दे का विशेष योगदान रहा। मोदी शाह की चुनावी रणनीति ने बूथ स्तर पर हिन्दुत्व की विचारधारा का विस्तार किया, जिसमें वह टीएमसी के विकल्प के रूप में उभरी। भाजपा की ऐतिहासिक जीत को लेकर भाजपा को सोचना होगा कि जिस असुरक्षा की भावना से जनमानस ग्रसित था, उनका विश्वास जीतना सरकार की प्राथमिकता होने के साथ ही घुसपैठियों को वापिस उनके देश भेजना होगा।
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