*lगली गली में शोर है, पत्रकार चोर है: सच्ची पत्रकारिता का अंतिम संस्कार

AYUSH ANTIMA
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​“गली-गली में शोर है, पत्रकार चोर है…” यह महज़ एक नारा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के ढहते हुए मलबे की आवाज़ है। कभी पत्रकारिता सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सच बोलने का साहस थी, आज वह सत्ता की दहलीज पर दुम हिलाता 'मैनेजमेंट' बन गई है। जिस पत्रकार को समाज का 'जागरूक प्रहरी' होना था, आज उसे 'ब्लैकमेलर' और 'दलाल' जैसे शब्दों से नवाज़ा जा रहा है। यह साख का संकट नहीं, यह इस पेशे की नैतिक मृत्यु का शोक गीत है। ​आज खबर की आत्मा इसलिए मर गई है क्योंकि उसे लिखने वाली कलम अब स्याही से नहीं, 'स्वार्थ' से चलती है। खबर अब तथ्यों से पैदा नहीं होती, बल्कि वातानुकूलित कमरों में बैठकर यह तय किया जाता है कि किसे 'मसीहा' बनाना है और किसका 'चरित्र हनन' करना है। जब पत्रकारिता जनसेवा का 'मिशन' छोड़कर मुनाफे का 'कमीशन' बन जाए, तो समझ लीजिए कि सच्चाई का कत्ल हो चुका है।
​जमीनी हकीकत तो और भी वीभत्स है। गली-कूचों में गले में 'प्रेस' का पट्टा लटकाए नए ज़माने के ये 'शिकारी' घूम रहे हैं। मोबाइल हाथ में लेते ही ये खुद को कानून से ऊपर समझ लेते हैं। इनका मकसद खबर दिखाना नहीं, बल्कि खबर की आड़ में 'सेटिंग' करना है। छोटे व्यापारियों और कर्मचारियों के लिए पत्रकारिता अब जानकारी का स्रोत नहीं, बल्कि 'सफेदपोश उगाही' का दूसरा नाम बन गई है। आज लोग पत्रकार को देखकर रास्ता इसलिए नहीं बदलते कि वे उससे डरते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वे उसकी 'गंदगी' से बचना चाहते हैं। ​टीवी चैनलों ने तो सूचना के नाम पर 'मानसिक प्रदूषण' फैला रखा है। प्राइम टाइम अब बहस का मंच नहीं, बल्कि 'चीखने वाले भाड़े के टट्टुओं' का अस्तबल बन गया है। ग्राफ़िक्स के शोर और एंकरों की नौटंकी ने खबर की गंभीरता को कॉमेडी सर्कस में तब्दील कर दिया है। यहाँ 'ब्रेकिंग न्यूज़' का मतलब सच की तलाश नहीं, बल्कि टीआरपी की दौड़ में सबसे पहले झूठ परोसना है।
​सोशल मीडिया तो 'फेक न्यूज़' की फैक्ट्रियां बन चुका है। सोशल मीडिया के 'स्वयंभू' पत्रकारों ने इसकी कमी पूरी कर दी है। बिना किसी जिम्मेदारी और बिना किसी जांच के, सिर्फ 'व्यूज' और 'लाइक्स' के लिए समाज में ज़हर घोला जा रहा है। आधी-अधूरी जानकारी को सनसनी बनाकर पेश करना अब कला बन गई है। नतीजा यह है कि आम आदमी अब खबर पर भरोसा नहीं करता, बल्कि हर हेडलाइन के पीछे का 'एजेंडा' तलाशता है। ​इस कीचड़ में सबसे ज्यादा नुकसान उन चंद ईमानदार कलमकारों का हो रहा है, जो आज भी सच के लिए अपनी जान और जीविका दांव पर लगाए बैठे हैं लेकिन अफसोस, भेड़ियों की इस भीड़ में उनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गई है। ​“गली-गली में शोर है...” यह नारा उस दिन बंद होगा जब पत्रकारिता फिर से 'प्रश्न' पूछना शुरू करेगी, न कि 'प्रशंसा' करना। जब खबर बिकाऊ माल के बजाय समाज का आईना बनेगी। ​आज खबर की आत्मा इसलिए मरी है, क्योंकि उसे जिंदा रखने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर थी, उन्होंने ही उसका सौदा कर लिया। कलम अगर बिक जाए, तो वह तलवार से ज्यादा खतरनाक होती है, क्योंकि तलवार शरीर को मारती है और बिकी हुई कलम राष्ट्र के चरित्र को।

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