सरकारी अस्पतालों में निर्मम लूटपाट: समय से पहले ही यमदूत की दस्तक

AYUSH ANTIMA
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आज सरकारी अस्पतालों की स्थिति उस बदहाल सरकारी स्कूल जैसी हो गई है, जहाँ शिक्षक कक्षा में जानबूझकर आधा-अधूरा पढ़ाता है ताकि छात्र उसके घर पर ट्यूशन पढ़ने को मजबूर हो जाएं। ठीक उसी तर्ज पर, सरकारी अस्पतालों के गलियारों में आज इलाज नहीं, बल्कि 'मरीजों का जत्था' तैयार किया जाता है, जिन्हें चतुराई से डॉक्टर के निजी क्लिनिक या घर की ओर धकेला जा सके। यह एक ऐसा संगठित खेल है, जहाँ सरकारी अस्पताल को केवल एक 'डिस्प्ले विंडो' बना दिया गया है, जबकि असली दुकान डॉक्टर के निजी आवास पर सजती है। ​अस्पताल के भीतर का दृश्य जानबूझकर इतना डरावना और नारकीय बनाया जाता है कि मरीज का हौसला जवाब दे जाए। ओपीडी में घंटों इंतजार के बाद जब तीमारदार डॉक्टर के सामने पहुँचता है, तो उसे परामर्श के बजाय तिरस्कार मिलता है। बेड मांगने पर 'जगह नहीं है' का रटा-रटाया जुमला उछाला जाता है और फर्श पर लेटने को मजबूर कर दिया जाता है लेकिन जैसे ही वही हताश मरीज डॉक्टर के घर की चौखट पर दस्तक देता है, पूरी तस्वीर जादुई रूप से बदल जाती है। जो बेड अस्पताल में 'नदारद' था, वह डॉक्टर के क्लिनिक पर 'तुरंत उपलब्ध' हो जाता है। अस्पताल की ठंडी और पथरीली जमीन पर तड़पते मरीज को निजी क्लिनिक पहुँचते ही न केवल चारपाई नसीब होती है, बल्कि वह डॉक्टर भी अचानक बेहद संवेदनशील और सेवाभावी हो जाता है जो कुछ घंटे पहले अस्पताल में बात तक करने को तैयार नहीं था। ​यह जत्थों का पलायन कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक डकैती है। सरकारी संसाधनों और मशीनों को 'खराब' बताकर बंद कर दिया जाता है ताकि डॉक्टर के घर के भीतर चल रहा मेडिकल स्टोर और जांच केंद्र चौबीसों घंटे नोट उगल सके। 
गरीब और मध्यम वर्ग के लिए यह स्थिति किसी दोहरी मार से कम नहीं है। एक तरफ वह टैक्स देता है ताकि उसे मुफ्त चिकित्सा मिले और दूसरी तरफ उसे उसी डॉक्टर से 'मानवीय व्यवहार' और एक अदद बिस्तर पाने के लिए अपनी जमापूंजी डॉक्टर के घर पर लुटाने को विवश होना पड़ता है। ​विडंबना देखिए कि व्यवस्था की इस सड़ांध ने AIIMS और जयपुर के SMS जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की मेहनत पर भी कालिख पोत दी है। जब इलाज का पैमाना सेवा नहीं, बल्कि 'घर आने की विवशता' बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि सरकारी स्वास्थ्य ढांचा वेंटिलेटर पर है। यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि उस भरोसे का कत्ल है जो एक आम आदमी सफेद कोट पर करता है। आज सवाल यह नहीं है कि अस्पताल में दवा है या नहीं। सवाल यह है कि क्या वह डॉक्टर के घर जाने की 'फीस' चुकाने की हैसियत रखता है। अगर नहीं, तो सरकारी अस्पताल की फर्श ही उसकी नियति बनकर रह जाती है।

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