सरकारी नपुंसकता से गुलाबी नगर स्वाहा: हर जगह जाम व अतिक्रमण का बोलबाला

AYUSH ANTIMA
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जयपुर की समस्या अब केवल बढ़ते वाहनों की एक सांख्यिकीय चुनौती नहीं रह गई है, बल्कि यह उस प्रशासनिक और रणनीतिक खोखलेपन का जीवंत प्रमाण है, जिसने एक नियोजित शहर को अराजकता के ढेर पर ला खड़ा किया है। हर साल हजारों नए पहिए सड़कों पर उतर रहे हैं, लेकिन सड़कों का भूगोल वहीं ठहरा हुआ है, बल्कि अतिक्रमण की दीमक ने उसे और भी संकरा कर दिया है। यह स्थिति उस 'ट्रैफिक कोलैप्स' का आगाज़ है जहाँ जाम कोई अस्थायी बाधा नहीं, बल्कि शहर की स्थायी नियति बन जाता है। 
यहाँ सड़कों पर कोई नियम नहीं चलता, केवल ताकत और अवसर का खेल चलता है; जहाँ एक ही संकरी गली में पैदल चलता इंसान, सामान ढोता ठेला, ई-रिक्शा, ऑटो और लग्जरी कारें एक-दूसरे में उलझी रहती हैं। यह दृश्य किसी आधुनिक महानगर का नहीं, बल्कि एक ऐसे शहरी तंत्र की हार का है, जिसने वक्त के साथ खुद को ढालने की तैयारी ही नहीं की। ​इस अराजकता का सबसे क्रूर प्रहार जयपुर की उस विरासत पर हुआ है, जिसने इसे विश्व मानचित्र पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज कराया था। परकोटा क्षेत्र, जो कभी अपनी स्थापत्य कला और सांस्कृतिक गरिमा के लिए जाना जाता था, आज व्यावसायिक लालच की एक दमघोंटू प्रयोगशाला बन चुका है। भवनों का अवैध विस्तार और दुकानों का सड़कों तक बेखौफ फैलाव इस कदर हावी है कि इतिहास अब केवल सरकारी बोर्डों पर सिमट कर रह गया है। अगर यह तबाही इसी रफ्तार से जारी रही, तो आने वाले कुछ ही वर्षों में 'हेरिटेज' शब्द केवल एक खोखला लेबल बनकर रह जाएगा और यह क्षेत्र एक अनियोजित, अति-घनत्व वाले कबाड़खाने में तब्दील हो जाएगा। सबसे त्रासद पहलू यह है कि यह सब किसी प्राकृतिक आपदा की तरह नहीं हुआ, बल्कि प्रशासन की आंखों के सामने और शायद उसकी मौन सहमति से हुआ है। नगर निगम, विकास प्राधिकरण और ट्रैफिक पुलिस की जवाबदेही केवल कागजी खानापूर्ति तक सिमट गई है, जहाँ अतिक्रमण हटाने की रस्म अदायगी तो होती है, लेकिन राजनीतिक दबाव और वोट बैंक की विवशता उसे कभी स्थायी समाधान तक नहीं पहुंचने देती। ​अगर आज इस व्यवस्था में कोई बड़ी सर्जरी नहीं की गई, तो 2036 का जयपुर एक शहरी दुःस्वप्न जैसा होगा। वह एक ऐसा शहर होगा, जहाँ दूरियां किलोमीटर में नहीं, बल्कि घंटों में मापी जाएंगी, जहाँ प्रदूषण का स्तर सांसों को जोखिम बना देगा और आपातकालीन सेवाएं गलियों के शोर में दम तोड़ देंगी। जयपुर उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ वह 'रहने लायक' शहर की श्रेणी से बाहर होने की कगार पर है। यह गिरावट धीमी जरूर है, लेकिन पूरी तरह सुनिश्चित है। यह चेतावनी का आखिरी समय है क्योंकि समस्या अब नीतियों के निर्माण की नहीं, बल्कि जमीन पर इच्छाशक्ति की कमी की है। अगर आज भी अतिक्रमण पर कठोर प्रहार नहीं हुआ और पुराने शहर को इस व्यावसायिक भीड़ से मुक्त नहीं कराया गया, तो भविष्य में जयपुर की पहचान उसकी गुलाबी आभा से नहीं, बल्कि उस स्थायी अवरोध और घुटन से होगी, जिसने एक जीवित सभ्यता को अपने घेरे में ले लिया है। अब भी वक्त है कि इसे बचाने की कोशिशें फाइलों से निकलकर सड़कों पर नजर आएं, वरना हम एक महान विरासत के 'शहरी सुसाइड' के गवाह बनेंगे।

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