कभी राजस्थान की नौकरशाही के निर्विवाद 'सुल्तान' कहे जाने वाले पूर्व आईएएस सुबोध अग्रवाल की आंखों से निकले आंसुओं ने आज जयपुर के एसीबी मुख्यालय की दीवारों को एक खामोश गवाही दे दी है। जो अफसर कभी सूबे की फाइलों का भाग्य लिखता था, आज वह खुद को एक ऐसे दलदल में फंसा पा रहा है, जहां से निकलने का हर रास्ता बंद नजर आता है। शनिवार को पूछताछ के दौरान जब एक पुलिसकर्मी ने उनसे संवाद किया, तो प्रशासनिक रसूख का वह कड़ा आवरण ताश के पत्तों की तरह ढह गया और अग्रवाल की आंखों से आंसू निकल पड़े । रुंधे गले से उन्होंने बस इतना ही कहा कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे किस झमेले में फंस गए हैं। यह केवल एक अधिकारी के आंसू नहीं थे, बल्कि सत्ता के शीर्ष से जांच के कठोर धरातल पर हुए एक दर्दनाक पतन की सजीव तस्वीर थी, जिसने आज पूरे प्रशासनिक गलियारे में सन्नाटा पसरा दिया है। जलदाय विभाग में बतौर एसीएस रहते हुए जिन सुबोध अग्रवाल के सामने बड़ी-बड़ी कंपनियां और अधिकारी नतमस्तक रहते थे, आज वे खुद एक असहाय स्थिति में जूनियर कर्मचारियों के कड़े सवालों का सामना कर रहे हैं। एसीबी की रिमांड में उनकी दिनचर्या अब किसी रसूखदार अधिकारी की नहीं, बल्कि एक सामान्य आरोपी की है। सफेद टी-शर्ट और लोअर में नजर आ रहे अग्रवाल को एसीबी मेस से उपलब्ध कराया जा रहा साधारण नाश्ता और भोजन लेना पड़ रहा है। डायबिटीज और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों से ग्रस्त होने के कारण उनकी नियमित चिकित्सकीय जांच तो की जा रही है, लेकिन उनके चेहरे पर पसरा मानसिक दबाव किसी भी दवा से परे नजर आता है। जांच एजेंसियों का पूरा फोकस जल जीवन मिशन के उन टेंडरों और भुगतान प्रक्रियाओं पर है, जिन्होंने राजस्थान के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को भ्रष्टाचार के दागों से भर दिया। इस पूरे घटनाक्रम में नियति का सबसे क्रूर प्रहार तब हुआ, जब अग्रवाल को अपनी सास के निधन की खबर मिली। शिमला में हुए इस देहांत के बाद उन्होंने अदालत से अंतिम संस्कार में शामिल होने की गुहार लगाई, लेकिन कानूनी बाधाओं और जांच की गंभीरता के चलते उनकी यह अंतिम मानवीय याचिका भी खारिज कर दी गई। अपनी अंतिम पारिवारिक विदाई में शामिल न हो पाने की टीस और भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों के बीच घिरे अग्रवाल अब पूरी तरह टूट चुके हैं। यह मामला अब केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि उस सिस्टम की एक चेतावनी बन गया है, जहां सत्ता और रसूख की चमक जांच के घेरे में आते ही फीकी पड़ जाती है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या सुबोध अग्रवाल इन आरोपों के चक्रव्यूह से निकल पाएंगे या फिर जांच एजेंसियां उनके खिलाफ ऐसे साक्ष्य पेश करेंगी, जो इस घोटाले की कड़ियों को सत्ता के और भी ऊंचे गलियारों तक ले जाएंगी।
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