आज रो रो धरा कहती अपनी व्यथा।
कहां से वापस लाऊ अपनी कोई सुंदरता।
भू, पृथ्वी धरा, धरती मां मैं कहलाती किंतु सबसे ज्यादा शोक मैं अपनी संतानों से ही पाती।
आज पूछती मैं तुमसे मेरे सुत सुताओ क्यों छीन ली तुमने इस मां से इसकी ममता।
आज रो रो धरा कहती अपनी व्यथा। कहां से वापस लाऊ अपनी खोई सुंदरता।
मेरी नदियां, जो प्रेम के निर्झर है बहाती।
जीवन अमृत जल देकर तुम्हारी पिपासा मिटाती।
इनकी निर्मल जलधारा तुम्हारी देह में जीवंतता लाती।
फिर क्यों तुमसे ये केवल मलीनता ही पाती।
मत कहो मुझे मां मुझे रहने दो केवल निम्नगा।
आज रो रो धरा कहती अपनी व्यथा।
कहां से वापस लाऊ अपनी खोई सुंदरता।
जिस हरितिमा की चादर ओढ़े मैं बनती लाजवंती।
झूला डाले मुझमें सावन उन्माद हो मैं खिलती बसंती।
पतझड़ हटाता घूंघट मेरा मानो हो कोई वधु नववारिका।
पर तुमने काटकर मेरे वृक्षों को, छीन ली मुझसे मेरे अलंकार और समवृद्धि।
आज तुम्हारे सामने क्यों अभतृका बन चित्कार मुझे करना पड़ा।
आज रो रो धरा कहती अपनी व्यथा।
कहां से वापस लाऊ अपनी खोई सुंदरता।
मेरे मस्तक नागराज का करके छेदन।
तुमने कर दिया मेरी आत्मा का विच्छेदन।
इस दर्द से मेरे प्राण करते दिन रात क्रंदन।
बंद करो मेरी संतानों करना मेरा खंडन।
इन कु कृत्यों ने तुम्हारे छीन ली मेरी बलों बुद्धि और जिजीविषा। आज रो रो धरा कहती अपनी व्यथा।
कहां से वापस लाऊ अपनी खोई सुंदरता।
चीर कर मेरा सीना बना लिए घर, कोठियां और भवन।
किंतु कही रिक्त ना छोड़ा एक कोना कहीं भी, लगाने को एक बाग, बगीचा, और उपवन। तुमने तो छीन ली मेरी सुरम्य चंचलता।
आज रो रो धरा कहती अपनी व्यथा।
कहां से वापस लाऊ अपनी खोई सुंदरता, कहां से वापस लाऊ अपनी खोई सुंदरता।