बीकानेर: बीकानेर अपना 539वां स्थापना दिवस मना रहा है। शहरवासी इस खास दिन को न सिर्फ आतिशबाजी बल्कि स्पेशल भोजन के साथ भी सेलिब्रेट कर रहे हैं। आज अक्षय द्वितीया और कल अक्षय तृतीया के अवसर पर लोगों के घरों में गेहूं का खीचड़ा बनाया जाएगा, वहीं कोल्ड ड्रिंक क
*चंदा उड़ाने की 539 साल पुरानी परंपरा*
बीकानेर में चंदा उड़ाने की 539 साल पुरानी परंपरा अक्षय तृतीया (स्थापना दिवस) पर निभाई जाती है, जिसे राव बीकाजी ने शुरू किया था। यह लगभग 4 फीट का गोल, कागज-सरकंडे से बना पतंगनुमा ढांचा होता है, जिसे धागे की जगह रस्सी से उड़ाया जाता है। यह परंपरा सामाजिक संदेश, पर्यावरण संरक्षण और शहर के गौरव का प्रतीक मानी जाती है।
*जूनागढ़ और परकोटे में उड़ता है चंदा*
सुबह जूनागढ़ परिसर में दो गुणा दो आकार का गोल चंदा उड़ाया जाता है। यह चंदा मांझे से नहीं बल्कि रस्सी से उड़ता है। जूनागढ़ के साथ ही शहर के विभिन्न हिस्सों में भी चंदा उड़ाने की परंपरा निभाई जाती है। खासकर कीकाणी व्यासों के चौक में गणेश व्यास और उनका परिवार हर वर्ष स्वयं चंदा बनाकर उसे उड़ाते हैं।
*चंदे पर लिखे जाते हैं सामाजिक संदेश*
पहले यह परंपरा राजसी संदेशों के आदान-प्रदान का माध्यम थी, लेकिन अब इस पर सामाजिक संदेश लिखे जाते हैं। चंदा उड़ाने वाले कलाकार “खेजड़ी बचाओ”, “बाल विवाह रोको” और पर्यावरण संरक्षण जैसे संदेश लिखकर इसे आसमान में उड़ाते हैं, जिससे समाज में जागरूकता फैलाई जाती है।
*विशेष पारंपरिक भोजन की तैयारी*
बीकानेर के घरों में दो दिनों तक खीचड़ा बनाया जाएगा। गेहूं और बाजरे का खीचड़ा अलग-अलग दिनों में तैयार होता है। अक्षय द्वितीया के दिन आमतौर पर गेहूं का खीचड़ा बनाया जाता है। इसके लिए गेहूं को पानी में भिगोकर कूटा जाता है, लेकिन पूरी तरह नहीं तोड़ा जाता, ताकि वह फूल भी जाए और अखंड भी रहे। यह परंपरा “अक्षय” यानी अटूटता का प्रतीक मानी जाती है, जो बीकानेर की एकता को दर्शाती है। इसके साथ इमली को कुछ घंटे भिगोकर उसका पानी यानी इमलाणी तैयार की जाती है। यह गर्म धूप में पतंग उड़ाने वालों को लू से बचाने के साथ-साथ ठंडा पेय (कोल्ड ड्रिंक) का काम भी करती है।