आप पार्टी के राज्यसभा सांसदों द्वारा दल बदल कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है और न ही किसी विचारधारा की लड़ाई है। देखा जाए तो यह भारतीय राजनीति के गिरते लोकतांत्रिक मूल्यों की पराकाष्ठा है। दल बदल के इस कैंसर से कोई भी दल अछूता नही है। थोक के भाव में इस दल बदल को लेकर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राजनीतिक मूल्यों को लेकर चिंता व्यक्त की है लेकिन अशोक गहलोत शायद भूल गये कि उन्होंने बसपा के 6 विधायकों का कांग्रेस में विलय कर सरकार बचाई थी। अशोक गहलोत को भी यह सार्वजनिक करना होगा कि उन्होंने उन विधायको को आखिर कितने में खरीदा था। यह दल बदल भारतीय राजनीति का वह घिनौना रूप है, जहां पैसों की खनक के आगे सिध्दांत और विचारधारा दम तोड़ देते हैं। देश ने स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई की वह भाजपा भी देखी है, जब उनकी सरकार गिर गई और उन्होंने कहा था कि घोड़े बिकने को तैयार थे लेकिन खरीददार नहीं मिल रहा था। बेमेल गठबंधन को लेकर अटल जी ने आन द रिकार्ड लोकसभा में कहा था कि ऐसी बेमेल गठबंधन सरकार को वह चिमटे से भी पकड़ना पसंद नहीं करते। यह वह समय था कि अटल जी अपने सहयोगियों को साथ लेकर चले। अब भाजपा केवल सत्ता प्राप्ति का पर्याय बन चुकी है। जिस जोश से राघव चड्डा ने भाजपा का दामन थामा है, उनको इतिहास देख लेना चाहिए कि ज्योतिरादित्य सिधिया, पंजाब में सुनील जाखड व अमरेन्द्र सिंह, जितिन प्रसाद, बहुगुणा, देवड़ा , चव्हाण अनेकों उदाहरण है, जिनका दम घुटने से सांस लेना दूभर हो गया था और शुद्ध हवा की प्राप्ति के लिए भाजपा में आये थे लेकिन इतिहास के पन्नों में उनका नाम दर्ज हो गया। जिस भाजपा ने अपने सहयोगी राजनीतिक दलों की वह हालत कर दी, जैसे भगवान कृष्ण ने गोपियों के कपड़े चुराकर कर दी थी। अकाली शिरोमणी दल, उडीसा में बीजू पटनायक, महाराष्ट्र में शिवसेना, शरद पवार व ताजा उदाहरण बिहार में नितिश कुमार का है। दल बदल वह दीमक है, जो भारतीय लोकतंत्र को खोखला कर रही है। इसका मुख्य कारण सत्ता का लोभ और पद की लालसा के साथ ही जांच एजेंसियों का वह डर है, जिसको लेकर सत्ता पक्ष भयभीत करते रहते हैं। इसके साथ ही राजनितिक दलों मे आंतरिक लोकतंत्र का अभाव और कमान कुछ ही हाथों में होने के कारण नेता दल बदल कर लेते हैं। चुनावी राजनीति के महंगे होने के कारण अक्सर बडे दल छोटे दलों के विधायको व सांसदों को खरीद लेते हैं। यह खरीद उन मतदाताओं के विश्वास की हत्या है, जिसके बलबूते पर वे चुनाव जीतकर गये थे। भारतीय राजनीति की काली कोठरी में कोई भी अछूता नहीं, हमाम में सब नंगे हैं।
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