भारतीय राजनीति में नैतिकता का नग्न रूप

AYUSH ANTIMA
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यदि भारतीय राजनीति की बात करें तो नैतिकता, विचारधारा, सिध्दांत व ईमानदारी जैसे शब्दों की भारतीय राजनीति के शब्दकोष में कोई जगह नहीं है। जिस लोकतंत्र की बात यह सफेदपोश करते हैं, वह लोकतांत्रिक व्यवस्था पैसे की खनक के नीचे दबकर दम तोड़ती नजर आ रही है। आजकल दल बदल एक वैचारिक असहमति न होकर निजी स्वार्थ की पूर्ति का हथियार बन गया है। यह उन लाखों मतदाताओं के मतों का खुल्लम खुल्ला सौदा है या यह कहे कि उनके विश्वास को यह नेता सरेआम नीलाम करते नजर आ रहे हैं। स्वार्थ की इस वेदी पर आमजन के विश्वास की आहुति देकर उसको दफन कर रहे हैं। भारतीय राजनीति अब जनसेवा का माध्यम न होकर नैतिक मूल्यों की नीलामी का बाजार हो गया है, जहां चुने हुए प्रतिनिधि भेड़ बकरियों की तरह अपना मूल्य तय करते हैं। नेताओं द्वारा विचारधारा व सिध्दांतों को ताक पर रखकर केवल सत्ता सुख के लिए दल बदलना और बिकाऊ माल होने का माहौल बनाना लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। भारतीय राजनीति में दलबदल वास्तव मे एक कोढ या कैंसर की तरह है, जिसमें लोकतांत्रिक मूल्यों, राजनीतिक नैतिकता और जनता के विश्वास और भरोसे को गहरे घाव दिए हैं। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने निजी स्वार्थ, अपने गुनाहो पर पर्दा डालने, धन या पद के लालच मे उस पार्टी को छोड़ देते हैं, जिसके कारण वे सांसद और विधायक बने थे। दलबदल उन मतदाताओं के जनादेश का सीधा अपमान है क्योंकि लोग विचारधारा और पार्टी के आधार पर वोट देते हैं न कि व्यक्तिगत रूप से किसी बिकने वाले उम्मीदवारों को। दलबदल भीतर से भारतीय लोकतंत्र को खोखला कर रहा है, जहां विचारधारा के उपर सत्ता का लालच हो गया है। उपरोक्त तथ्य उस राघव चड्डा के लिए है, जिन्होंने अपने सिध्दांतों को तिलांजलि देकर भाजपा की गोद में बैठ गये। कल तक राघव चड्डा जिस भाजपा को देशद्रोही व भ्रष्टाचारी बता रहे थे, आज वह राजा हरिश्चंद्र जैसी ईमानदार और परम राष्ट्रभक्त हो गई है। राघव चड्डा ने संसद में अपने शब्द बाणो से वह जमीन तैयार की थी कि उसका मूल भाव कुछ ज्यादा लग जाए। आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) ने अपने लेख में इस बात को लेकर चिंता जाहिर की थी कि पढ़े लिखे लोग भारतीय राजनीति से दूरी बना रहे हैं व राजनीति में आने से कतराते हैं लेकिन राघव चड्डा ने साबित कर दिया कि शिक्षित व्यक्ति राजनीति की मंडी में अच्छे दामों में बिकता है। अब किसी शिक्षित व्यक्ति पर से भी भरोसा उठ गया कि कहीं वह उनको सरेआम नीलाम न कर दे। यह भारतीय राजनीति के गिरते स्तर का वीभत्स चेहरा है, जहां नैतिकता अर्थ के पैरों तले रौंद दी जाती है। ऐसे बिकाऊ माल का इलाज तभी संभव है कि जब मतदाताओं को अपने जनप्रतिनिधि को चुनने का अधिकार है तो उनके द्वारा चुने गये बिकाऊ माल को उसी स्थान पर भेज दिया जाए, जहां से उसने सांसद या विधायक बनने का सफर प्रारंभ किया था।

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