महिला आरक्षण विधेयक का इतिहास

AYUSH ANTIMA
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संसद के गलियारे में शुक्रवार का दिन भारी उलटफेर वाले दिन के रूप में याद किया जायेगा, जब मोदी के 12 साल के कार्यकाल में मोदी सरकार को लोकसभा में मुंह की खानी पड़ी क्योंकि 131वां नारी शक्ति वंदन अधिनियम बिल लोकसभा में पारित नहीं हो सका। इस बिल के गिरने का कारण भाजपा की हठधर्मिता, आत्ममुग्धता और विपक्षी दलों को विश्वास में न लेना रही। भाजपा ने अपने चुनावी फायदे के मध्यनजर इसे परिसीमन से जोड़कर पेश किया। चूंकि पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं और इस समय लोकसभा का विशेष सत्र का आहुत करना भाजपा की सोची-समझी साजिश थी। भाजपा को यह भलीभांति पता था कि यह बिल पास नहीं हो पायेगा और इसका ठीकरा कांग्रेस के सर फोड़कर चुनावी लाभ ले लेगी। भाजपा अपने इस मकसद में कामयाब भी हो गई और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में चुनावी भाषण देकर कांग्रेस का करीब साठ बार नाम लिया व महिलाओं के हितैषी होने का पूरा नाटक भी किया। महिलाओं की हितैषी नरेंद्र मोदी सरकार को सोचना होगा कि महिला आरक्षण बिल का संसद के गलियारों में चक्कर लगाने का सफर 30 साल पुराना है। पहली बार 12 सितम्बर 1990 को एचडी देवगौड़ा नेतृत्व वाली सरकार के दौरान यह बिल पेश किया गया था, जो 81वे संविधान संशोधन बिल के रूप मे लाया गया था। उस समय 11वी लोकसभा भंग होने के कारण बिल आगे नहीं बढ़ सका था। 1998 मे अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने 12वी लोकसभा मे इसे 84वे संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश किया गया लेकिन आम सहमति न बन पाने के कारण ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद 1999 में दुबारा प्रयास होने के बाद 2003-2004 में लाने की कोशिश की गई लेकिन इस बार भी परिणाम वहीं रहा। 2008-2010 के बीच का समय इस बिल के लिए ऐतिहासिक माना जाता है कि मार्च 2010 में भारी हंगामे के बीच इसे राज्यसभा ने तो पास कर दिया लेकिन सरकार के घटक दलों की धमकी के कारण सरकार इसे लोकसभा में लाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। शुक्रवार को इस बिल का लोकसभा में गिरने को परिसीमन से जोड़कर देखा जा रहा है लेकिन इतिहास गवाह है कि इस बिल के गिरने के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्रियो ने राष्ट्र के नाम संबोधन में विपक्ष को नहीं कोसा व महिलाओ के हितैषी होने का नाटक, जो मोदी सरकार कर रही है नहीं किया। मोदी सरकार को भली-भांति पता था कि यह बिल पास नहीं होगा और इसका चुनावी फायदा लेंगे। यदि भाजपा सच्चे मन से महिलाओं के प्रति संवेदनशील और हितैषी है तो इस बिल को लेकर सर्वदलीय बैठक बुलाकर सर्व सम्मति का माहोल बनाना चाहिए था व इसके साथ ही परिसीमन के मुद्दे को लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों से संवाद करना चाहिए था लेकिन उसको तो महिलाओं के हितैषी होने का ढोंग करना था और वह राष्ट्र के नाम संबोधन में देखने को मिला।

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