राजस्थान की प्रशासनिक मशीनरी आज एक ऐसे ऐतिहासिक भंवर में फंसी है, जहाँ सतह पर सब कुछ शांत और 'साफ' दिखता है, लेकिन भीतर ही भीतर सिस्टम लकवाग्रस्त हो चुका है। मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास की व्यक्तिगत ईमानदारी आज प्रदेश के लिए सबसे बड़ा 'छलावा' साबित हो रही है, क्योंकि इसी बेदाग छवि की ओट में प्रशासनिक पंगुता के गहरे घावों को ढका जा रहा है। जमीनी अनुभव का अकाल और कागजी नेतृत्व शासन की विडंबना देखिए कि जिस व्यक्ति के पास राजस्थान की भौगोलिक और सामाजिक नब्ज समझने के लिए जरूरी 'फील्ड अनुभव' का नितांत अभाव है, उसे पूरे प्रदेश की कमान सौंप दी गई। महज साढ़े तीन साल का छिटपुट फील्ड कार्यकाल, जिसमें जोधपुर और पाली जैसे जिलों में चंद महीनों की 'विजिटिंग कार्ड' नुमा नियुक्तियां शामिल हैं, किसी भी नजरिए से मुख्य सचिव की कुर्सी के लिए पर्याप्त नहीं है। जिसने कभी राजस्थान की तपती धूल नहीं फांकी, जिसे गाँवों की जटिलताओं और तहसीलों में जड़ जमाए भ्रष्टाचार का जमीनी इल्म नहीं, वह एयर-कंडीशन्ड कमरों में बैठकर फाइलों के जरिए न्याय का ढोंग कैसे कर सकता है। यही अनुभवहीनता आज उनकी लीडरशिप के लिए गले की फांस बन गई है। सचिवालय के गलियारों में यह चर्चा आम है कि प्रशासन आज 'दौड़' नहीं रहा, बल्कि 'घिसट' रहा है। जब शीर्ष पर बैठा कप्तान ही दिशाहीन और किंकर्तव्यविमूढ़ हो तो अधीनस्थ अफसरशाही का बेलगाम होना स्वाभाविक है। वरिष्ठ अधिकारियों की नजर में श्रीनिवास एक ऐसे 'विजन-लेस' कप्तान हैं, जिनकी स्पष्टता के अभाव में अधीनस्थ अफसर अपनी-अपनी ढपली पर अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। सचिवालय में आदेश केवल कागज पर जन्म लेते हैं और फाइलों में ही दफन हो जाते हैं।
फाइलों पर नोटिंग्स का वजन तो बढ़ रहा है, लेकिन जनता के हक में होने वाले फैसलों की रफ़्तार 'शून्य' हो चुकी है। अधीनस्थ अमले में मुख्य सचिव का न खौफ है और न सम्मान। इस प्रशासनिक विफलता को और भी वीभत्स बनाता है श्रीनिवास का 'आत्ममुग्धता' और 'पब्लिसिटी' के प्रति गहरा झुकाव। धरातल पर ठोस काम करने के बजाय, वे अपनी ब्रांडिंग और चर्चाओं में बने रहने को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह 'शोमैनशिप' राजस्थान के लिए आत्मघाती सिद्ध हो रही है। ईमानदारी व्यक्तिगत आभूषण हो सकता है, लेकिन जब वह अक्षमता का कवच बन जाए, तो वह पूरे तंत्र के लिए अभिशाप बन जाती है। सचिवालय के गलियारों में एक कड़वा सच यह भी तैर रहा है कि मुख्य सचिव के पास 'वक्त ही वक्त' है, लेकिन 'दृष्टि' नहीं। चूंकि वे अकेले हैं, इसलिए सुबह 9 बजे ही दफ्तर की कुंडी खोल देते हैं और महावीर जयंती या संक्रांति जैसे अवकाश के दिनों में भी 'दौरों' का स्वांग रचते हैं। उनके इस एकाकीपन और समय काटने की मजबूरी का खामियाजा पूरे प्रशासनिक अमले को भुगतना पड़ता है। कर्मचारियों और अफसरों के लिए यह अतिरिक्त बोझ बन गया है, क्योंकि उनके पास सीएस की तरह 'टाइम पास' करने की विलासिता नहीं है। श्रीनिवास अपने नंबर बढ़ाने की कला में माहिर हैं। मुख्यमंत्री को गुलदस्ता भेंट करने से लेकर अपनी पब्लिसिटी के लिए फोटोग्राफरों की फौज साथ रखने तक, वे किसी भी अवसर को हाथ से नहीं जाने देते। खबर बनाने की यह कला और सोशल मीडिया ग्रुप्स में तुरंत वाहवाही लूटने की होड़ उनके पद की गरिमा को कमतर करती है। राजस्थान आज 'फाइलों के जादूगर' की नहीं, बल्कि एक ऐसे जुझारू और अनुभवी नेतृत्व की तलाश में है, जो सिस्टम को फिर से पटरी पर ला सके। वरना, श्रीनिवास की यह 'खामोश और आत्ममुग्ध ईमानदारी' प्रदेश को प्रशासनिक अराजकता की उस गर्त में धकेल देगी, जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं होगी।
*महेश झालानी*
वरिष्ठ पत्रकार, जयपुर