राजनीति में शिक्षित और समझदार लोगों का न आना देश के विकास और शासन व्यवस्था के लिए निश्चित रूप से एक घातक स्थिति है। राजनीति एक ऐसा क्षेत्र है, जहां समाज के लिए दूरगामी फैसले लिए जाते हैं। देश व प्रदेश के विकास के खाके की तस्वीर खींची जाती है। जन कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर गहन मंथन होता है और इसके लिए बौद्धिक क्षमता, नैतिकता व दूरदर्शिता अति आवश्यक होती है। राजनीति को अक्सर शैक्षणिक बहस के बजाए स्ट्रीट फाईट माना जाता है, जहां शिक्षित लोग असहज महसूस करते हैं। चुनावों को जीतने के लिए बाहुबल और धनबल का बोलबाला रहने के साथ ही भारतीय राजनीति में जातिवाद का जहर होने से अच्छे लोग इससे दूरी बना लेते हैं। यदि अनपढ़ लोग राजनीति में आ गये तो इसका परिणाम होता है कि विज्ञान, अर्थव्यवस्था और तकनीकी से संबंधित जटिल फाईलें नहीं समझ पाते हैं और गलत फैसलों की संभावनाएं बढ़ जाती है। इसके साथ ही ऐसे नेताओं की अधिकारियों पर निर्भरता बढ़ जाती है, जो इसका लाभ लेते हुए गलत कामों पर दस्तखत करवा लेते हैं। यदि शिक्षित लोग राजनीति से परहेज़ करेंगे तो देश प्रदेश की बागडोर अयोग्य लोगों के हाथों में चली जायेगी, जो देश के विकास के लिए नुकसानदायक होगी। संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि शिक्षित लोगों का राजनीति में हिस्सा न लेने का सबसे बड़ा दंड यह है कि अयोग्य व्यक्ति आप पर हुकुम जताने लगता है। उपरोक्त लेख लिखने की प्रेरणा आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) के स्तम्भ कार्टूनिस्ट महेंद्र सिंह शेखावत की एक बेहतरीन कार्टून देखकर मिली कि आजकल एक ऐसे प्रदेश के मुख्यमंत्री शिक्षित होने को लेकर चर्चा में है, जहां कभी विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय हुआ करती थी व यह प्रदेश भी है, जिसने देश को अनगिनत प्रशासनिक अधिकारी दिए और आज उसी प्रदेश का मुख्यमंत्री अपनी शिक्षा को लेकर सोशल मीडिया का निशाना बने हुए हैं। किसी भी दल के मुख्यमंत्री के चयन को लेकर पार्टी के आलाकमान का विशेषाधिकार होता है लेकिन वह तब चर्चा का विषय बन जाता है, जब विधायको की मर्जी के विरूद्ध उपर से थोपा जाए, जैसा कि राजस्थान के मुख्यमंत्री को पर्ची के मुख्यमंत्री का खिताब मिला हुआ है।
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