धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
By -
0


भाई रे यौं विनसै संसारा, काम क्रोध अहंकारा॥ लोभ मोह मैं मेरा, मद मंछर बहुतेरा॥ आपा पर अभिमाना, केता गर्ब गुमाना॥ तीन तिमिर नहिं जांहीं, पंचों के गुण मांहीं॥ आतम राम न जाना, दादू जगत दिवाना॥
अर्थात संसारी पुरुष इन कारणों से स्वयं ही नष्ट हो जाता है। वे कारण हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, पदार्थों में तेरा, मेरा भाव अर्थात् ये तेरे हैं, ये मेरे हैं, ऐसी भेद बुद्धि, ईर्ष्या तेरे मेरेपन का अभिमान, गुण और (विद्याओं) का अभिमान, शरीराभिमान, पाचों इन्द्रियों के पाचों विषय में अनुराग, ये सब दोष मनुष्यों के विनाश के कारण हैं। अत: बुद्धिमान् मनुष्यों को इनका त्याग कर देना चाहिये। इन दोनों के रहते हुए तूलामूलालेशा अविद्या का नाश नहीं हो सकता किन्तु प्रतिदिन इनका अभिमान बढता ही जाता है। इन्हीं कारणों से संसारी-पुरुष राम को न जानकर सांसारिक सुखों में रमण करते रहते हैं और बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। अत: साधक को चाहिये कि इन दोषों को जीतने का प्रयत्न करे। इन दोषों को जीतने के लिये मन की दुर्वृति का खण्डन, मन के आवेग को रोकना, माया के योग से जो पूर्व संस्कार हैं, उनका दमन करना। यदि किसी कारण से बुद्धि दूषित हुई तो इस संसार रूपी घोर जंगल में भटकना पड़ता है। उस समय दम्भ का निग्रह करना पड़ता है। केवल आत्मा ही ऐसी पर्णकुटी है, जहां शान्ति मिलती है। अन्यत्र तो क्लेश ही क्लेश है। इस आत्म-कुटी में काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि शत्रु प्रवेश भी नहीं कर सकते। आशा, तृष्णा की भी वहां गति नहीं, मोह भी नहीं जा सकता। वहीं पर शुद्ध सात्विक माया का आश्रय प्राप्त होता है, उस समय जब कि रजोगुणी माया का विलय हो जाता है। इससे सुख का नाम भी नहीं रहता, सर्वत्र दुःख ही दुःख नजर आता। उससे आगे शोकभङ्ग का दर्जा आता है। उस समय हृदय में विवेक उत्पन्न होता है, साथ ही भक्ति का उद्रेक भी होता है। उस समय अज्ञान नष्ट हो जाता है। उत्साह से हृदय भर जाता है। तीन गुण वाले इस शरीर का सबसे पहले यह काम है कि जैसे भी बन सके, इस जीव को अज्ञान से छुड़ाना चाहिये। जब प्राणी मद का निग्रह कर लेता है, तब वह लिङ्ग-सूक्ष्म-निग्रही कहलाता है। मद के निग्रह के बाद मात्सर्य और अहंकार का निग्रह करना चाहिये। जिस समय प्राणी लिङ्गनिग्रही हो जाता है, उस समय माया के परास्त होने का समय आता है क्योंकि वास्तव में माया और है भी क्या, इन्हीं काम, क्रोध आदि दुष्टों के संग से माया का निर्माण होता है, इनके नष्ट हो जाने पर प्राणी को आनन्द ही आनन्द है। माया के त्याग से सात्विकी माया का प्रादुर्भाव होता है। उस सात्विकी माया के साथ प्राणी उत्तम हृदयाकाश का सुख अनुभव करने लगता है। उसका उत्कर्ष होने पर महाकाश का निर्माण होता है। सत्-चित्, आनन्द, यह तीनों वहां पर विद्यमान रहते हैं। इसी महान् समुद्र में कूद जाने को ही आत्मा की कल्याणदायिनी मुक्ति कहते हैं।

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!