अतीत कालखंड में शेखावाटी के भामाशाहो का निस्वार्थ भाव से समाज सेवा करना ही मुख्य ध्येय था। उनके द्वारा निर्मित धर्मशाला, स्कूल, अस्पताल, कालेज, कुंए व बावडी इस बात का गवाह रहे हैं कि उनकी समाज सेवा में कोई स्वार्थ नहीं था। यह अपनी जन्मभूमि व जनता के प्रति प्रेम का प्रतीक था कि उन्होंने क्षेत्र में समाज सेवा के अनगिनत काम किए। समाज सेवा की आड़ में उन्होंने रिटर्न की आशा नही रखी। यदि राजनीति के परिपेक्ष्य में समाज सेवा को देखे तो समाज सेवा निस्वार्थ भाव से लोगो की मदद व सेवा करने का माध्यम है, जिसे राजनीति में प्रवेश के एक प्रभावी और जमीनी जरिये के रूप में देखा जा सकता है। समाज सेवा के अनुभव से नेतृत्व कौशल का विकास होने के साथ ही जन समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता का भी विकास होता है। समाज सेवा के माध्यम से राजनीति में आना गलत नहीं है, बशर्ते वह जनहित के लिए हो न केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए हो। यदि सेवा का सच्चा भाव है तो यह राजनीति का सबसे बडा सार्थक माध्यम है लेकिन सेवा केवल सत्ता प्राप्ति का साधन है तो यह जनता के साथ विश्वासघात से कम नहीं है। यह भी देखा गया है कि समाज सेवा केवल एक ढाल या मुखौटा है, जिसके पीछे छुपकर राजनीति की जाती है। आधुनिक समाजसेवी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए अपने समाज को सीढ़ी की तरह काम में लेते हैं। यह देखा गया है कि जब तक वे किसी बड़े पद पर विराजमान रहते हैं, समाज के लोगों में दुर्गंध आती है और रिटायर होने के बाद समाज सेवा का जज्बा हिलौरें मारने लगता है। यह कथित समाजसेवी बड़े बड़े आयोजन करके अपनी राजनीतिक पैठ जमाने में कामयाब होने के बाद समाज को ठेंगा दिखा देते हैं। जिले में आगामी सरपंचों व नगर निगमों के मध्यनजर बहुत से समाजसेवियो की बाढ देखने को मिल रही है। बड़े बड़े धार्मिक आयोजनों के जरिए भरकम निवेश इस आशा के साथ से करते हैं कि इस निवेश का अच्छा रिटर्न मिलेगा। जिले में ऐसे भी समाजसेवी देखे गये है कि यदि भाजपा ने टिकट नहीं दिया तो कांग्रेस की गोद में बैठ जाते हैं व टिकट की बाट इस तरह देखते हैं, जैसे बगुला मछली का इंतजार कर रहा हो। यदि कांग्रेस में भी बात नहीं बनती है तो निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव में ताल ठोक देते हैं क्योंकि आखिरकार उन्हें समाज सेवा करनी है। यदि बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जाता है और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतकर आए गये तो अच्छा मोल मिलने की संभावना प्रबल हो जाती है। सर्व समाज की बात करने वाले समाजसेवी जब अपने समाज के ही नहीं हो सकते तो सर्व समाज को उनसे आशा करना बेमानी ही होगा।
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