पूर्व मुख्यमंत्री व प्रदेश की कद्दावर नेता वसुंधरा राजे का अपने समर्थकों को लेकर एक बार फिर उनका दर्द छलका। मौका था भारतीय जनता पार्टी के 47वे स्थापना दिवस पर आयोजित समारोह का। राजे ने दो टूक शब्दों में कहा कि जिन कार्यकर्ताओं में संगठन के प्रति निष्ठा व समर्पण का भाव हो, जिन्होंने पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर संघर्ष किया है, जो पार्टी के प्रति अपनी पूरी निष्ठा रखते हो, ऐसे कार्यकर्ताओं को मौका मिलना चाहिए। राजनीतिक नियुक्तियों के समय उन्हीं कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो मूल भाजपा के है। अवसरवादियों को ऐसी नियुक्तियों से दूर ही रखना चाहिए। यदि वसुंधरा राजे के उपरोक्त बयान को देखें तो यह बयान आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) के उन लेखों पर मुहर लगाता है, जिनमें समाचार पत्र ने गुटबाजी हावी होने व भाजपा के निष्ठावान व पुराने कार्यकर्ताओं को दरकिनार करने का मुद्दा उठाया था। उन लेखों पर राजे के बयान ने मुहर लगा दी है कि पार्टी पर आयातित नेताओं का कब्जा हो गया है। मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा का यह बयान गले नहीं उतरता, जिसमें उन्होंने कहा कि भाजपा कार्यकर्ता पद की लालसा नहीं रखता है लेकिन शायद वे भूल गये कि यह भाजपा पंडित दीनदयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी व भैरोसिंह शेखावत के कार्यकाल वाली भाजपा नहीं रही, जिसमें जमीनी स्तर के कार्यकर्ता को भी सम्मान मिलता था। अब सवाल यह उठता है कि जब मंत्रिमंडल में ही पूरी नियुक्तियां नहीं हो पाई तो निगम, बोर्ड, आयोग और प्राधिकरण के अध्यक्षों की नियुक्तियों को लेकर बात करना बेमानी होगा। वसुंधरा राजे के इस बयान को झुन्झुनू जिले की राजनीति के परिपेक्ष्य में देखे तो यह सटीक बैठता है। जिले में भाजपा अब मूल भाजपाईयों की पार्टी न होकर आयातित नेताओं की पार्टी हो गई है। संगठन के कार्यक्रमों में आयातित नेता ही मंच की शोभा बढ़ाते नजर आते हैं, जिनका भाजपा की नितियों व सिध्दांतों से दूर का रिश्ता नहीं है। भाजपा में मची खींचतान का नतीजा देखने को मिला कि एक तरफ भाजपा अपना स्थापना दिवस मना रही थी तो दूसरी तरफ जिला मुख्यालय पर पार्टी के स्वागत बैनर और होर्डिंग पर अतिक्रमण की आड़ में प्रशासन का बुलडोजर चल रहा था। प्रशासन की यह कार्रवाई राजनीतिक असंवेदनशीलता का परिचायक है। स्थानीय कार्यकर्ताओं को इस कार्यवाही को लेकर नाराजगी देखने को मिल रही है कि उनके उत्साह और सम्मान पर बुलडोजर चलाया गया है। इसको लेकर भाजपा जिलाध्यक्ष पर भी सवाल उठने लाजिमी है कि वह जिला प्रशासन से इस मामले को लेकर संवाद करने में असमर्थ रही। बैनर, होर्डिंग फाड़ने की यह कार्यवाही सिर्फ एक प्रशासनिक कार्यवाही नहीं बल्कि संगठनात्मक कमजोरी को उजागर करती है। इसके साथ ही एक ज्वलंत प्रश्न यह भी है कि आखिर प्रशासन को भाजपा के किस गुट की शह थी, जिसको लेकर बुलडोजर की कार्यवाही को अंजाम दिया गया।
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