प्रदेश में कोचिंग सेंटर्स का मकड़जाल एक गंभीर समस्या बन चुका है, जो प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में महामारी की तरह फ़ैल गया है। यह केवल शिक्षा देने का जरिया नहीं बल्कि एक व्यवसाय बन चुका है। यह शिक्षा माफिया बच्चों को सपनों की सैर करवाकर अपने जाल में फंसाने में कामयाब हो रहे हैं। अर्थ युग की इस अंधी दौड़ में युवा वर्ग बढ़िया नौकरी पाने की लालसा में इनकी गिरफ्त में आ जाता है। कोचिंग संस्थान वाले छात्रों पर पढ़ाई को लेकर इतना दबाव बनाते हैं, जिससे वे तनाव, आस्वाद और आत्महत्या जैसी घटनाओं का शिकार हो जाते हैं। छात्रों को झूठे वादे, स्कालरशिप का लालच देकर एकमुश्त मोटी रकम वसूल लेते हैं। दिखावे के लिए कुछ कोचिंग संस्थान अपने छात्रों को कार, मोटरसाइकिल व स्कूटी देने का प्रलोभन देते हैं, जिससे बच्चे उनके जाल में फंस जाते हैं। इसके साथ ही यह भी देखा गया है कि कुछ कोचिंग संस्थान मोटी फीस इकठ्ठी कर रातों रात आफिस के ताला लगाकर फरार हो जाते हैं। यह कोचिंग सेंटर वाले छात्रों को मोटीवेशन टाक परोसते हैं और छात्रों को भरोसा दिलाते हैं कि उसका चयन होना निश्चित है। सफलता की इस अंधी दौड़ में बहुत से कोचिंग सेंटर्स शिक्षा की गुणवत्ता व छात्रों की सुरक्षा से समझौता कर रहे हैं, जिससे वे डैथ चैम्बर (मृत्यु कक्ष) की तरह बनते जा रहे हैं। एक एक क्लासरूम में क्षमता से अधिक छात्रों को बैठाया जाता है, जिससे आग लगने या भगदड़ जैसी स्थिति में सुरक्षा का खतरा बढ़ जाता है। कोचिंग संचालको ने इसको व्यवसाय के रूप में परिवर्तित कर दिया है, वे छात्रों की सुरक्षा व पढ़ाई की गुणवत्ता से ज्यादा अपने मुनाफे पर ध्यान केन्द्रित रखते हैं। इन संस्थानों में बढ़ती असुरक्षा की भावना से छात्रों में तनाव व मानसिक दबाव बढ़ रहा है, अभिभावकों के लाखों रूपये खर्च करने के बावजूद अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता है। शिक्षा के मंदिर की आड़ में चल रहे इन संस्थाओं में बच्चों की जिंदगी को खतरे में डाला जा रहा है, जो समाज के लिए एक बदनुमा दाग है। कोचिंग सेंटर्स को प्रतिभाओं को बर्बाद करने वाले बनने से रोकने के लिए सरकार को सख्त कदम उठाने की जरूरत है। सरकार को इन संस्थानों के लिए सुरक्षा मानकों को अनिवार्य करने के साथ ही अनियमितता पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। छात्रों की जान को लेकर कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है।
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